अमेरिका ने पीठ दिखा कर भागने में भी नयी मिसाल कायम कर दी है

By अशोक मधुप | Aug 16, 2021

अफगानिस्तान में अमेरिका सेना की मौजूदगी में तालिबान ने सत्ता कब्जा ली। जबकि अमेरिका सेनाओं को 31 अगस्त को अफगानिस्तान खाली करना था। अमेरिकी सेनाओं के पूरी तरह अफगानिस्तान खाली करने से पहले ही तालिबान ने अफगानिस्तान को अपने कब्जे में ले लिया। राष्ट्रपति निवास उनके अधिकार में आ गया। हालत बिगड़ते देख अफगानिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपने परिवार और साथियों को लेकर अफगानिस्तान छोड़ गए। उनके जाते ही राष्ट्रपति भवन पर तालिबान पहुंच गए। यह भी सूचना है कि सत्ता का भी तालिबान को हस्तानांतरण हो गया। सूचना है कि अमेरिका का हथियारों का बड़ा जखीरा तालिबान के हाथ लगा है। वहां से आ रहे समाचार अच्छे नहीं हैं। ऐसे में काबुल में हर एक को अपनी जान बचाने की पड़ी है। अधिकांश विदेशी और अमेरिका का समर्थन करने वाले और सहयोग करने वाले अपनी जान बचाने के लिए चिंतित हैं। वे जानते हैं कि तालिबानी उन्हें बख्शेंगे नहीं। काबुल में अफरातफरी है। वहां भगदड़ का माहौल है। एयरपोर्ट का रास्ता पूरी तरह जाम है।

सबसे बड़ी चीज है देखने में आ रही है कि अफगानिस्तान के अधिकांश प्रदेशों के राजनयिक और पुलिस बल अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने की घोषणा करने के बाद तालिबान से मिल गए। ऐसा होने पर तालिबान को ना कुछ करना पड़ा ना उससे जाकर मिलने वाले अफगान के अधिकारियों और पुलिस जवानों को ही परेशानी उठानी पड़ेगी। एक भी गोली नहीं चली और तालिबान काबिज हो गया। सूचना है कि सेना खुद अपने हथियार तालिबान को सौंप रही है।

तालिबान युग लौट आया ऐसा सोचा भी नहीं गया था। अब क्या-क्या जुल्म वहां होंगे, इसकी कल्पना में ही रोंगटे कांपने लगते हैं। उसके पुराने आदिम युग से अफगानिस्तान के भविष्य की कल्पना ही की जा सकती है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी किरकिरी अमेरिका की हुई है। जैसे वह अफगानिस्तान से भागा, ऐसे ही पीठ दिखाकर वियतनाम से भागा था। अफगानिस्तान में अकेले अमेरिका के साथ ऐसा नहीं हुआ, उससे पहले रूस के साथ भी ऐसा हुआ था। रूस को भी लंबी जंग लड़ने के बाद यहां से पीछे हटना पड़ा था। वह तो अपने हथियार और गोला बारूद भी छोड़कर भागा था। अब अमेरिका फ़ौज की मौजूदगी में कब्जा हुआ यह बहुत शर्म की बात है।

इसे भी पढ़ें: तालिबान की जीत सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र की भी सबसे बड़ी हार है

अफगानिस्तान की लड़ाई और उसके पतन में एक बात साफ निकल कर आयी कि संयुक्त राष्ट्र संघ एक हाथी के दांत की तरह दिखावटी है। उसकी कुछ क्षमता नहीं। कोई ताकत नहीं। शक्ति सम्पन्न बड़े देश उसे अपने पक्ष में मोड़ने में सक्षम हैं। जहां उनकी नहीं चलती, उसे रोकने के लिए उनके पास वीटो पावर है। अफगानिस्तान के पतन से आज संयुक्त राष्ट्र संघ के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। सँयुक्त राष्ट्र संघ कुछ कर नहीं सकता। उसमें विचार चलता रहा, दोहा में समस्या के हल पर बड़ी शक्तियां विचार करती रहीं और तालिबान का काबुल पर कब्जा हो गया। वीटो पावर का अधिकार रखने वाले सभी देश अफगानिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन होते देखते रहे और कुछ भी नहीं कर सके। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने सदस्य देशों में शांति कायम रखने, आपातकाल में वहां के प्रशासन से सहयोग करने के लिए बना है, लेकिन यहां वह फेल हो गया।

अफगानिस्तान की सीमा पर बैठी रूस, चीन जैसी महाशक्तियां तालिबान से भयभीत हो उनसे समझौते पर उतर आईं। पाक पहले ही तालिबान के पीछे खड़ा है। अमेरिका भी हाल में इसी रास्ते की ओर बढ़ रहा था। सब अपनी बचाने में लगे हैं। अफगानिस्तान और उसकी जनता को बचाने से किसी का लेना-देना नहीं।

-अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

प्रमुख खबरें

Manik Saha ने पूरा किया वादा: Judo Star Asmita Dey को मिला 10 लाख का Check और अगरतला में अपना घर

Commonwealth Fencing Championship: लागोस में Team India का दबदबा, तीसरे दिन 3 Gold समेत जीते 5 पदक

England Test Captain Joe Root ने खिलाड़ियों पर से हटाया Night Curfew, कहा- अपनी Responsibility खुद समझें Team Members

India vs Sri Lanka Test: Washington Sundar के बाहर होने से Team India की बढ़ी मुश्किलें, लगा बड़ा झटका