By रेनू तिवारी | Mar 06, 2026
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न कोई दुश्मन, बस 'हित' सर्वोपरि होते हैं। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए तनाव ने अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। कल तक जो अमेरिका रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25% दंडात्मक शुल्क (टैरिफ) लगा रहा था, आज वही अमेरिका भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों की विशेष छूट देने को तैयार है। इसे कूटनीतिक हलकों में भारत की बड़ी जीत और अमेरिका का 'नरम पड़ता रुख' माना जा रहा है।
उन्होंने कहा कि यह ‘‘सोच-समझकर उठाया गया अल्पकालिक कदम’’ है और इससे रूसी सरकार को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि यह केवल तेल के उन लेनदेन को अधिकृत करता है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए तेल से जुड़े हैं। बेसेंट ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘भारत, अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार है और हमें पूरी उम्मीद है कि नयी दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाएगा। यह अस्थायी कदम ईरान द्वारा वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को अवरुद्ध करने की कोशिश से पैदा हुए दबाव को कम करेगा।’’
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क (टैरिफ) लगाया था। अमेरिकी प्रशासन का कहना था कि नयी दिल्ली द्वारा तेल की खरीद यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को बढ़ावा देने में मदद कर रही है। पिछले महीने अमेरिका और भारत ने घोषणा की थी कि दोनों देशों के बीच व्यापार पर एक अंतरिम समझौते के लिए एक रूपरेखा तय हो गई है। इसके बाद ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क को हटा दिया और यह भी कहा कि नयी दिल्ली ने मॉस्को से ऊर्जा आयात बंद करने एवं अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है।