By अभिनय आकाश | Apr 16, 2025
रतन टाटा, जॉन एफ केनेडी, आनंद महिंद्रा, बराक ओबामा, मार्क जुकरबर्ग, जॉर्ज बुश, टीएस इलियट ये सारे नाम आते भले ही अलग अलग दुनिया से हैं। लेकिन एक धागा ऐसा है जो इन सभी को जोड़ देता है। अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी की लाल दीवारों में इन सभी के जीवन के कुछ साल बीते हैं। लेकिन इन लाल दीवारों के लिए 14 अप्रैल का दिन अच्छा नहीं था। 18 अक्टूबर 1636 के दिन ये यूनिवर्सिटी बनी थी। इन 389 बरसों में अपने हार्ड वर्क से हावर्ड ने बहुत कुछ कमाया। पहला आर्गेन ट्रांसप्लांट यहीं के लोगों ने किया। जो ओआरएस आप पीते हैं, यहीं के एक शख्स ने बनाया। एमआरआई भी यहीं से शुरू हुई। लिस्ट बहुत लंबी है। लेकिन अमेरिका में नया निजाम आ चुका है जो देश को नए सिरे से ग्रेट बनाना चाहता है। ग्रेट बनाने के चक्कर में घर के बाहर तो अमेरिका की चाल ढाल बदल ही गई है। घर के अंदर भी अमेरिका की नई परिभाषा के मुताबिक ग्रेटनेस की मुहिम शुरू हुई है।
ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड को लिखे पत्र में व्यापक सरकारी और नेतृत्व सुधारों का आह्वान किया, जिसके तहत हार्वर्ड को योग्यता-आधारित प्रवेश और नियुक्ति नीतियां स्थापित करनी होंगी, साथ ही विविधता संबंधी विचारों पर अध्ययन निकाय, संकाय और नेतृत्व का लेखा-जोखा भी रखना होगा। इसमें चेहरे पर पहने जाने वाले मास्क पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। यह मांग फलस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाने के लिए की गई प्रतीत होती है। हार्वर्ड के अध्यक्ष एलन गार्बर ने सोमवार को हार्वर्ड समुदाय को लिखे एक पत्र में कहा कि ये मांगें विश्वविद्यालय के प्रथम संशोधन अधिकारों का उल्लंघन करती हैं और शीर्षक 6 के तहत सरकार के अधिकार की वैधानिक सीमाओं को पार करती हैं।
गार्बर ने लखा कि किसी भी सरकार को - चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो - यह निर्देश नहीं देना चाहिए कि निजी विश्वविद्यालय क्या पढ़ा सकते हैं, किसे प्रवेश दे सकते हैं और किसे नियुक्त कर सकते हैं, तथा अध्ययन और जांच के किन क्षेत्रों को आगे बढ़ा सकते हैं।’’ उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने यहूदी-विरोधी भावना को दूर करने के लिए व्यापक सुधार किए हैं।