अस्तित्व संकट के बीच पारिवारिक एकता का राग

By उमेश चतुर्वेदी | Jan 02, 2026

राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यहां कोई न तो स्थायी दोस्त होता है और ना ही कोई स्थायी दुश्मन। राजनीति में ऐसे कम ही उदाहरण मिलेंगे,जहां दोस्ती के मूल में दिल का रिश्ता होता है। गौर से देखें तो संभावनाओं, चुनौतियों और अवसरों की बुनियाद पर पर दोस्ती या दुश्मनी के रिश्ते आगे बढ़ते हैं। महाराष्ट्र के दो राजनीतिक परिवारों के मिलन को भी इसी अंदाज और संदर्भ में देखा जाना चाहिए। राज्य का पवार परिवार हो या फिर ठाकरे कुनबा, अगर एक होता नजर आ रहा है या एक हुआ है तो इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों परिवारों के प्रमुख अलंबरदारों के दिल मिल चुके हैं। बल्कि राजनीतिक संभावनाओं और अवसरों ने उन्हें एक होने को प्रेरित किया है। 


चाहे ठाकरे परिवार हो या फिर पवार कुनबा, दोनों में कुछ समानताएं हैं। शरद पवार हों या बाल ठाकरे, एक दौर में दोनों की महाराष्ट्र की राजनीति में तूती बोलती थी। पिछली सदी के आखिरी दशक में तो राजनीतिक हलके का एक बड़ा हिस्सा शरद पवार को देश का भावी प्रधानमंत्री तक मानने लगा था। इसी तरह महाराष्ट्र के टाइगर के रूप में बाल ठाकरे की ख्याति रही। दोनों ही राजनीतिक खानदानों के मुखिया का स्वाभाविक उत्तराधिकारी दोनों के भतीजे ही माने जाते थे। एक दौर तक शरद के उत्तराधिकारी के तौर पर देश और प्रदेश अजित पवार को देखता था। इसी तरह शिवसैनिक भी बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे को अगली पीढ़ी का ठाकरे सीनियर मान चुका था। लेकिन जब उत्तराधिकार सौंपने की बारी आई तो पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सुले पर भरोसा जताया और बाल ठाकरे ने अपने छोटे बेटे राज ठाकरे को। ऐसे हालात में अजित और राज ठाकरे को अपना भविष्य चुनौतीपूर्ण लगा, राजनीतिक संभावनाएं कम होती दिखीं तो दोनों ने अपनी राह अलग कर ली। उन्नीस साल पहले राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली तो अजित पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के मूल धड़े पर ही कब्जा कर लिया। पार्टी के असल संस्थापक शरद पवार पुछल्ला पार्टी लेकर एक तरह से किनारे का दल संभालने लगे। 

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पवार परिवार और ठाकरे कुनबे में बिखराव की कहानी भी अलग-अलग रही। जब तक बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे अपनी शिवसेना को बीजेपी के साथ खड़ा रखे, तब तक तो उनके नेतृत्व को चुनौती नहीं मिली। दल का राज्य में ठीकठाक समर्थन भी रहा। हालांकि महत्वाकांक्षाओं के साथ अलग हुए राज ठाकरे को राजनीतिक सफलताएं न के बराबर मिलीं। लेकिन जब से उद्धव ने बीजेपी को छोड़ कांग्रेस और पवार की एनसीपी का साथ पकड़ा, राजनीतिक मैदान में उसका आधार घटने लगा। वहीं पवार सीनियर से अलग होने के बावजूद बीजेपी के साथ के चलते अजित का राजनीतिक रूतबा कम नहीं हुआ। अलबत्ता कभी भारत के प्रधानमंत्री मैटेरियल देखे जाते रहे वरिष्ठ पवार की सियासी साख घटती चली गई। कुनबे में बिखराव के चलते दोनों परिवारों की राजनीतिक ताकत बीजेपी के सामने बौनी होती जा रही है। एक तरह से कह सकते हैं कि दोनों परिवारों के राजनीतिक अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगा है। 


एक कहावत है, मरता क्या नहीं करता। राजनीतिक अस्तित्व पर जब बन आती है तो कम ही सियासी हस्तियां होती हैं, जो समझौते नहीं करतीं। इसे समझदारी कहें या फिर राजनीति की रवायत, ठाकरे परिवार और पवार कुनबा-दोनों ही एक होने जा रहे हैं। पारिवारिक बिखराव को समेटने की कोशिश तेज हो गई है। ठाकरे बंधु तो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके एक हो चुके हैं, जबकि पवार परिवार अपने गढ़ बारामती में एक होने का संकेत दे रहा है। बारामती में हाल ही में पवार परिवार ने एक आयोजन किया, जिसमें आज के प्रमुख उद्योगपति गौतम अडानी के मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। इसे पवार कुनबे ने खूब प्रचारित किया। इस प्रचार का संदेश साफ है कि दोनों परिवार एक होने जा रहे हैं। 


चाहे ठाकरे कुनबा हो या फिर पवार परिवार, अगर दोनों एक हो रहे हैं तो उसकी सिर्फ अस्तित्व की रक्षा भी नहीं है, बीजेपी रूपी चुनौती से पार पाना भी है और मुंबई महानगर पालिका, पुणे महानगर पालिका और पिंपरी चिंचवड़ महानगर पालिका पर कब्जे की चाहत भी है। मुंबई महानगर पालिका का सालाना बजट सत्तर हजार करोड़ रूपए का है। यह रकम उत्तर पूर्व के राज्यों के समूचे बजट से भी ज्यादा बैठती है। पिंपरी-चिंचवड़ महानगर पालिका के दायरे में एशिया का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। जाहिर है कि यहां से कर के रूप में मोटी रकम आती है। ठाकरे परिवार की एकता के पीछे एक कारण जहां बृहन्नमुंबई महानगर पालिका पर कब्जा जमाना है, वहीं पवार परिवार की एकता के पीछे  पुणे महानगरपालिका और पिंपरी-चिंचवड़ महानगर पालिका पर कब्जा जमाना है। दोनों परिवारों को लगता है कि अगर वे बिखरे रहे तो उनके प्रभाव वाली महानगरपालिकाओं में उन्हें कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। यहां यह बताना जरूरी है कि एक दौर में बीएमसी पर शिवसेना का कब्जा रहता था तो पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में पवार परिवार का। दोनों परिवारों के मिलन के पीछे की बड़ी वजह यही है। 


भारतीय जनता पार्टी का इतिहास देखिए, अपने विस्तार के पहले चरण में वह अपने साथी दलों के सहयोग पर निर्भर रही। बाद के दौर में उसने खुद का प्रभाव बढ़ाया और अपने दम पर वह स्थापित होती चली गई। हरियाणा, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात के बाद अब इसी तरह वह महाराष्ट्र में वह अपने  दम पर उभर चुकी है। जबकि कुछ साल पहले तक महाराष्ट्र में एक तरह से शिवसेना के छोटे भाई की भूमिका में रहती थी। अब चाहे शिवसेना का टूटा हुआ धड़ा हो या अजित पवार वाली एनसीपी, दोनों उसके छोटे भाई की भूमिका में हैं। जिस तरह निकाय चुनावों में बीजेपी ने अपना दबदबा कायम किया है, उससे पवार परिवार की भी चिंताएं बढ़ी हैं और ठाकरे खानदान की भी। इसीलिए दोनों परिवार एक हुए हैं या होते नजर आ रहे हैं। पवार परिवार अब एक साथ पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के चुनाव में उतरने जा रहा है तो ठाकरे परिवार मुंबई में। लेकिन यह तय है कि दोनों परिवारों के रिश्तों की मजबूती इन महापालिका चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगी। अगर उन्हें जीत मिली तो तय है कि पारिवारिक गठबंधन आगे बढ़ेंगे, और ऐसा नहीं हुआ तो दोस्ती की नई राह तलाशने की कोशिशें फिर से तेज होंगी।


-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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