मिशन कश्मीर आसान नहीं था, पर अमित शाह को मुश्किलें हल करने की आदत है

By नीरज कुमार दुबे | Aug 14, 2019

गृहमंत्री बनते ही अमित शाह ने सबसे पहले किसी राज्य का दौरा किया था तो वह था कश्मीर और यह भी शायद पिछले दो-तीन दशकों में पहली बार हुआ था कि भारतीय गृहमंत्री के घाटी दौरे पर कोई बंद आयोजित नहीं किया गया था। 70 बरसों से कश्मीर जिस समस्या में जकड़ा हुआ था उससे उसको मुक्ति दिलाने के लिए अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गनिर्देशन में और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का सहयोग लेते हुए पहले ही दिन से काम शुरू कर दिया था और इसी का प्रतिफल है कि अमित शाह के 'मिशन कश्मीर' के चलते राज्य में बंदूकें गरजना बंद हुई हैं, लोगों का विश्वास जीता जा रहा है और राज्य स्थायी अमन चैन के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है। जम्मू-कश्मीर ने अनुच्छेद 370 हटने का जश्न भी मनाया तो ईद पर भी खुशियाँ एक दूसरे के साथ बांटी गईं। और अब स्वतंत्रता दिवस भी पूरे उल्लास के साथ मनाया गया। कश्मीर को लेकर भ्रम फैलाने वाले नेताओं और पाकिस्तान की सरकार को यह दृश्य देख लेने चाहिए कि आम कश्मीरी किस तरह अब पहले से ज्यादा खुश हैं।

कश्मीरियों के चेहरों पर खुशी और भविष्य के प्रति आशान्वित होने के यह भाव यूँ ही नहीं आये हैं। इसके लिए मोदी सरकार की ओर से अनेकों राहत भरे कदम उठाये गये। शायद देश या दुनिया ने ऐसा उदाहरण पहले नहीं देखा होगा कि कोई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार किसी राज्य के हालात को संभालने के लिए वहां पूरी तरह से डेरा डाल ले। अजीत डोभाल ने सिद्ध किया कि वह सिर्फ आतंकवाद रोधी ऑपरेशन चलाने में माहिर नहीं हैं बल्कि अमन-चैन बहाल करने में भी सिद्धहस्त हैं।

कश्मीर के हालात की बात करें तो ऐसा नहीं था कि आतंकवादी हमलों में सिर्फ हमारे जवान ही शहीद हो रहे थे बल्कि आतंकवाद का सबसे ज्यादा दंश यदि किसी को झेलना पड़ा है तो वह आम कश्मीरियों को झेलना पड़ा है। मोदी सरकार की आतंकवाद को बिलकुल बर्दाश्त नहीं करने की नीति रही है और इसी नीति को बड़ी चतुराई, बड़ी कड़ाई, बड़ी गहराई और बड़ी सफाई से आगे बढ़ाते हुए गृहमंत्री ने अपनी योजना का खाका खींचा जिसे हम अमित शाह का कश्मीरनामा भी कह सकते हैं।

गृहमंत्री ने पहले आतंकवाद निरोधी कानूनों को सख्त बनाने, जाँच एजेंसियों को और ज्यादा ताकत देने की तैयारी की। संसद के हालिया समाप्त हुए सत्र में सरकार ने दोनों सदनों में विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण संशोधन विधेयक 2019 को मंजूरी दिलाने में सफलता अर्जित की। इस विधेयक का उद्देश्य आतंकवाद से संबंधित मामलों की जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में कई कठिनाइयों को दूर करना है। विधेयक पर हुई चर्चा के जवाब में गृहमंत्री ने साफ कहा था कि आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए देश में ‘‘कठोर से कठोर कानून’’ की जरूरत है और यूएपीए कानून में संशोधन देश की सुरक्षा में लगी जांच एजेंसी को मजबूती प्रदान करने के साथ ‘‘आतंकवादियों से हमारी एजेंसियों को चार कदम आगे’’ रखेगा। यही नहीं सरकार ने विदेशों में आतंकवादी घटनाओं में भारतीय नागरिकों के प्रभावित होने की स्थिति में ‘एनआईए’ को मामला दर्ज कर अन्य देशों में जाकर जांच करने का अधिकार देने वाले एक महत्वपूर्ण विधेयक को भी संसद की मंजूरी दिलाई। आतंकवाद पर करारा प्रहार जारी रखते हुए केंद्र सरकार ने खालिस्तान समर्थक संगठन द सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) को भी इसकी कथित राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित कर दिया।

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अलगाववादियों पर भी अमित शाह सख्त रुख अपनाए हुए हैं और देश में ऐसा पहली बार देखने को मिला कि किसी अलगाववादी की संपत्ति जब्त की गयी। जुलाई माह के शुरू में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने आतंकवाद रोधी कानून के तहत कट्टरपंथी कश्मीरी अलगाववादी आसिया अंद्राबी के श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित मकान को जब्त कर लिया। एजेंसी ने गैर कानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम (यूएपीए) के तहत संपत्ति को जब्त किया। एनआईए ने पिछले साल नवंबर में अंद्राबी और उसके दो सहयोगियों के खिलाफ इंटरनेट का इस्तेमाल कर भारत के खिलाफ ‘जंग छेड़ने’ के आरोप में आरोप पत्र दाखिल किया था। अंद्राबी पर हुई कार्रवाई और टैरर फंडिंग करने और करवाने वालों पर पड़े छापों को देखते हुए अन्य अलगाववादी नेताओं को सांप सूंघ गया है और उन्हें अपनी उन संपत्तियों की चिंता सताने लगी है जोकि उन्होंने आम कश्मीरियों का हक मारकर बनाई हैं। इसीलिए आजकल अलगाववादी नेता चुप्पी साधे हुए हैं। ट्वीटर के जरिये वह लोगों को ना भड़कायें इसके लिए सरकार ने 8 अलगाववादियों के ट्वीटर हैंडल बंद करवाने की सिफारिश भी कंपनी से कर दी है। जम्मू-कश्मीर चूंकि अब केंद्र शासित प्रदेश बन चुका है, अनुच्छेद 370 और 35ए हट चुका है, इसलिए भारत सरकार के सभी कानून वहाँ पूरी तरह लागू होते हैं। यूएपीए संशोधन विधेयक संसद से पारित होकर कानून बन चुका है और इसमें आतंकी कार्यों में किसी भी प्रकार का सहयोग देने वाले को भी आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान किया गया है। तो घाटी में वह चंद लोग जो आतंकवाद को प्रश्रय देते थे वह भी अब ऐसा करने से हिचकेंगे।

पाकिस्तान को भी लग रहा है कि न्यू इंडिया में उसके लिए सबसे बड़ी मुश्किल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने हुए थे जो पहले किसी को छेड़ते नहीं हैं, लेकिन अगर कोई छेड़ता है तो उसे छोड़ते नहीं हैं। अब एक सशक्त गृहमंत्री भी आ गये हैं जो सिर्फ चेतावनी ही नहीं देते, सीधी कार्रवाई भी कर देते हैं। याद कीजिये हालिया संसद सत्र को जब अमित शाह ने कहा था कि पाकिस्तान ने आतंकवाद पर काबू पाने के लिये दक्षेस देशों के क्षेत्रीय समझौते (सार्क रीजनल कन्वेंशन ऑन सप्रेशन ऑफ टेररिज्म) पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं लेकिन भारत के पास उससे निपटने के लिये ‘‘सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक जैसे अन्य तरीके’ हैं।

गृहमंत्री अमित शाह की खासियत है कि वह अपने अधिकारियों पर पूरा भरोसा करते हैं और पूर्व अधिकारियों से सलाह-मशविरा भी करते हैं। जुलाई में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुफिया ब्यूरो के सेवानिवृत्त निदेशक राजीव जैन और रॉ के सेवानिवृत्त प्रमुख अनिल धसमाना के सम्मान में जब रात्रि भोज का आयोजन किया तो यह अनोखा था क्योंकि इससे पहले ऐसे आयोजन शायद ही किसी गृहमंत्री ने किये हों। इस रात्रिभोज में अमित शाह ने पूर्व अधिकारियों की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में उनके योगदान की सराहना की।

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बहरहाल, कश्मीर में स्थायी शांति और विकास में तेजी इस सरकार की प्राथमिकताओं में है। अब देखना होगा कि गृहमंत्री के तौर पर अमित शाह एनआरसी को पूरे देश में किस तरह लागू करा पाते हैं क्योंकि बतौर भाजपा अध्यक्ष हालिया लोकसभा चुनावों में उन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में यह वादा किया था।

-नीरज कुमार दुबे

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