अनुच्छेद 370 तो गया, अब कश्मीर से जुड़े झूठ को भी बेनकाब करिए जनाब

By संतोष पाठक | Publish Date: Aug 13 2019 2:21PM
अनुच्छेद 370 तो गया, अब कश्मीर से जुड़े झूठ को भी बेनकाब करिए जनाब
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देश की जनभावना भी यही चाहती थी कि जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह से भारत का हिस्सा बनाने के लिए, धरती के स्वर्ग को पूरे भारत के साथ खड़ा करने के लिए 370 को खत्म करना जरूरी है। 35ए को हटाना जरूरी है।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने जम्मू-कश्मीर को लेकर जो ऐतिहासिक फैसला किया है, उसका लाभ आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर दिखाई देगा। लगभग 70 वर्षों तक अनुच्छेद 370 के साथ जीने वाले कश्मीर को अब इसके बिना जीने की आदत डालनी होगी। इसको लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चाहे जिस स्तर पर भी हों लेकिन देशभर में जिस तरह से इस फैसले के बाद जश्न मनाया गया, उससे यह साफ हो गया कि देश की जनभावना भी यही चाहती थी कि जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह से भारत का हिस्सा बनाने के लिए, धरती के स्वर्ग को पूरे भारत के साथ खड़ा करने के लिए 370 को खत्म करना जरूरी है। 35ए को हटाना जरूरी है।
 
देश की संसद ने भी जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन बिल को भारी बहुमत से पारित करके यह साबित कर दिया कि संसद भी जनभावना के साथ है। कई विरोधी दलों ने भी जिस तरह से सरकार का साथ दिया, उससे यह साबित हो गया कि यह कानून भले ही सरकार लेकर आई हो लेकिन देश के राजनीतिक वर्ग का बहुमत इस बिल के पक्ष में है। हालांकि कुछ शंकाएं जरूर व्यक्त की जा रही हैं लेकिन इसका जवाब तो समय ही दे सकता है।
एक बात बार-बार कही जा रही है कि राज्य की जनता से नहीं पूछा गया। राज्य में कर्फ्यू का माहौल लगा कर इस तरह का फैसला थोपा गया। ये उसी तरह का झूठ है जो पिछले 70 सालों से लगातार कश्मीर को लेकर बोला जा रहा है। ये उसी तरह का झूठ है जिसे बोल-बोल कर कश्मीर की कई पीढ़ियों को बर्बाद कर दिया गया है। ऐसे में वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है। भारतीय संसद की मंजूरी के बाद जम्मू-कश्मीर नये नक्शे के साथ हमारे साथ तो होगा ही लेकिन अब वक्त आ गया है कि कश्मीर को लेकर लगातार बोले जा रहे झूठ को बेनकाब किया जाए।
 
जम्मू-कश्मीर का मतलब सिर्फ घाटी नहीं है


 
बार-बार ये कहा जाता है कि राज्य की सहमति नहीं ली गई। ऐसे लोगों को यह बताना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर का मतलब सिर्फ कश्मीर की घाटी नहीं है, जैसा आज तक झूठ बोल कर ये लोग साबित करते नजर आए हैं। जब बात जम्मू-कश्मीर की होती है तो इसमें जम्मू भी शामिल होता है और लद्दाख भी। क्या केंद्र पर आरोप लगाने वाले लोगों को जम्मू के लोगों की खुशी नहीं दिख रही है ? क्या ऐसे लोगों को यह नहीं दिख रहा है कि लद्दाख में दशकों पुरानी मांग को माने जाने को लेकर किस तरह से जश्न मनाया जा रहा है ? क्या ये लोग जम्मू और लद्दाख की जनता को जम्मू-कश्मीर का हिस्सा नहीं मानना चाहते और अगर मानते हैं तो जनसंख्या के आधार पर यह तय कर लीजिए कि प्रदेश की जनता का बहुमत इसके पक्ष में है या नहीं।
 
आज राज्य की जनता का विश्वास जीतने की बात करने वाले नेताओं से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि उन्होंने अब तक अपने-अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में जम्मू और लद्दाख की जनता का भरोसा जीतने के लिए क्या-क्या किया था ? प्रदेश के साथ धोखा क्यों हुआ किस-किसने किया ?


 
अब बात कश्मीर की कर लेते हैं। यह कहा जा रहा है कि कश्मीर में रक्तपात हो जाएगा, तो क्या अब तक कश्मीर शांत था ? यह सही है कि कश्मीर घाटी के कुछ जिलों में युवाओं को लगातार बरगलाया जाता रहा है, झूठ बोल-बोल कर। वर्तमान सरकार के कंधों पर अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी आ गई है कि बदले माहौल में कश्मीर घाटी के एक-एक युवा तक पहुंच कर उन्हें कश्मीर का सच बताया जाए। उन्हें यह बताया जाए कि अब तक तथाकथित कश्मीरी नेताओं ने उनके साथ कितना बड़ा धोखा किया है। कश्मीर में बड़े पैमाने पर एक जन-जागरण अभियान चलाकर गांव-गांव में जाकर यह बताने की जरूरत है कि 370 और 35ए की आड़ में उन्हें अब तक किस अंदाज में छला गया है।

भारत में विलय की शर्त है अनुच्छेद 370– यह है सबसे बड़ा झूठ
 
कश्मीर के चंद भटके हुए युवाओं को भारत में कश्मीर के विलय का सच बताने की जरूरत है, डंके की चोट पर बताने की जरूरत है। इन भटके हुए युवाओं को यह बताना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने बिना शर्त अपने राज्य का भारत में विलय किया था। भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर का संविधान भी अपने आप को भारत का अभिन्न अंग मानता है। वक्त आ गया है कि कश्मीरी युवाओं को विलय के सच से अवगत कराया जाए। उन्हें यह बताया जाए कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे और इस विलय-पत्र का खाका भी हूबहू वही था जिसका भारत में शामिल हुए अन्य सैंकड़ों रजवाड़ों ने अपनी-अपनी रियासत को भारत में शामिल करने के लिए उपयोग किया था। इसमें न कोई शर्त शामिल थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। ध्यान रहे जिस जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में 1947 में हुआ था उसके मुख्यतः पांच भाग थे- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगिट और बाल्टिस्तान।
विलय हुआ 1947 में और अनुच्छेद 370 को जोड़ा गया दो साल बाद 1949 में। बताइए दो साल बाद आने वाला 370 विलय की शर्त कैसे बन गया ? भारत के साथ जम्मू-कश्मीर राज्य के जुड़े रहने की शर्त कैसे बन गया 370 ? इसलिए इस झूठ को बोनकाब करना बहुत जरूरी है। यह बताना जरूरी है कि 370 को सिर्फ और सिर्फ एक कश्मीरी नेता को संतुष्ट करने के लिए संविधान में सबसे बाद में जोड़ा गया और वह भी अस्थायी प्रावधान के तौर पर। यह संविधान में सबसे आखिरी में जोड़ी गई धारा थी। जिसके फेस पर भी लिखा है 'टेम्परेरी प्रोविजन फॉर द स्टेट ऑफ द जम्मू और कश्मीर'। जब कोई आर्टिकल या धारा टेम्परेरी बनाई जाती है तो उसको सीज करने या हटाने की प्रक्रिया भी लिखी जाती है। 370 के इसी प्रावधान का सहारा लेते हुए इस अस्थायी अनुच्छेद को हटा दिया गया है। इसमें विवाद क्यों होना चाहिए ?
 
कश्मीर के युवाओं को 1947 का सही इतिहास बताना जरूरी है
 
कश्मीर के भटके हुए चंद युवाओं को 1947 का वास्तविक इतिहास भी बताना चाहिए ताकि उन्हें समझ आए कि पाकिस्तान और पाकिस्तान समर्थित आतंकी–अलगाववादी तत्वों ने धरती के जन्नत को क्या से क्या बना दिया है। उन्हें यह बताना चाहिए कि जमीनी हालात और पाकिस्तान की नापाक मंशा से बेखबर महाराजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर रियासत को पूर्व का स्विट्जरलैंड बनाना चाहते थे जो भारत-पाकिस्तान के बीच में स्वतंत्र और तटस्थ राष्ट्र होता। लेकिन उनके अरमानों पर अक्टूबर 1947 की 22 तारीख को पानी फिर गया जब पाकिस्तान समर्थित हजारों कबायलियों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। आजाद देश का सपना देखने वाले कश्मीर के राजा की सेना इतनी कमजोर थी कि उनका मुकाबला नहीं कर सकती थी। ये कबायली रास्ते में लूटपाट करते हुए, लोगों का कत्लेआम करते हुए, महिलाओं का बलात्कार करते हुए श्रीनगर की तरफ बढ़ते जा रहे थे। पाकिस्तान कश्मीर को हड़पने की अपनी योजना में कामयाब होता दिखाई दे रहा था क्योंकि डरे हुए महाराजा हरि सिंह श्रीनगर को उसकी किस्मत के सहारे छोड़ कर जम्मू भाग गए थे। बाद में उन्होंने भारत से मदद की गुहार लगाई।
 
अंग्रेज गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की शर्त की वजह से विलय हुए बिना भारतीय सेना श्रीनगर नहीं जा सकती थी। 26 अक्टूबर, 1947 को महाराजा ने भारत के साथ विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर किए वो भी बिना किसी शर्त के और इसके लिए महाराजा साहब को दिल्ली नहीं बुलाया गया था बल्कि उनके बुलावे पर गृह मंत्रालय के तत्कालीन सचिव वीपी मेनन जम्मू गए थे। उसके बाद भारतीय सेना के बहादुर जवानों ने प्रदेश की रक्षा के लिए पहले कबायलियों और बाद में पाकिस्तानी सेना के साथ लड़ाई लड़ी। जिस समय आपात स्थिति में भारतीय सेना को श्रीनगर जाने को कहा गया उस समय पूरा श्रीनगर अंधेरे में डूबा हुआ था। भारतीय सेना को यह तक नहीं पता था कि श्रीनगर एयरपोर्ट किसके कब्जे में है– महाराजा के सिपाहियों या कबायलियों के। ऐसे हालात में भारत ने रक्षा की जम्मू-कश्मीर की। जिस भारत ने कश्मीर को बचाया, सजाया-संवारा भला वो भारत कश्मीर के साथ कुछ गलत कैसे कर सकता है ? जिसने अपने हजारों सैनिकों को कश्मीर की रक्षा और शांति के लिए कुर्बान कर दिया वो कश्मीर में रक्तपात करने की इजाजत कैसे दे सकता है ?
 
370 के बाद कितना बदलेगा कश्मीर
 
कश्मीरी लोगों को वह सारी सच्चाई बतानी चाहिए जिसका खुलासा गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में भी किया। उन्हें यह बताना चाहिए कि भारत ने कितना बजट इस राज्य को अलॉट किया जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया इसी 370 की वजह से। सबसे बड़ी बात जो कश्मीरियों के दिलो-दिमाग में उतारनी होगी कि भारत के अभिन्न हिस्से के तौर पर उन्हें भी अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा करने का उतना ही अधिकार है जितना मराठी, गुजराती, बिहारी या देश के अन्य राज्य के लोगों को है। उन्हें बार-बार यह याद दिलाने की जरूरत है कि उनका राज्य छिना नहीं है। जैसे 370 अस्थायी था उसी तरह से केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा भी अस्थायी है (जैसा कि गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में बताया) और हालात बदलते ही इसे फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा। कश्मीरी युवाओं के मन में यह उतारना चाहिए कि वो बंदूक छोड़कर पहले कश्मीर को फिर से जन्नत बनाने के मकसद से राज्य के विकास के लिए काम करें और अगर लड़ना ही है तो भारतीय सेना में शामिल होकर पाकिस्तान और चीन के कब्जे में छटपटा रहे कश्मीरी भाई-बहन को आजाद कराने के लिए लड़ें। इसके बाद भी अगर कोई हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ता है तो फिर पंजाब का उदाहरण सबके सामने तो है ही।  
 
भारत सरकार की पहल
 
हालांकि राहत की बात यह है कि भारत सरकार इस दिशा में तेज़ी से कदम उठा रही है। चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का राज्य में रह कर लगातार लोगों से मुलाकात करना हो या सभी गांवों में तिरंगा फहराने जैसे फैसले, ये सब यह बताने के लिए काफी है कि कश्मीर में विकास का सवेरा जल्द आने वाला है बस सतर्क और चौकस रहने की जरूरत है पाकिस्तान के नापाक इरादों से और घर के गद्दारों से।
 
-संतोष पाठक
 

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