An Unforgettable Love Story: अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर विशेष

By प्रो. श्याम सुंदर भाटिया | Dec 24, 2024

“अटल बिहारी वाजपेयी के लुटियंस जॉन वाले बंगले में लोग जब अटल जी से मिलने जाते थे, तब उनको राजकुमारी कौल परिवार उसी बंगले में दिखता था। इसका मतलब है, अटल जी के साथ ही कौल परिवार उनके सरकारी बंगले में शिफ्ट हो गया था। कॉलेज की मित्र राजकुमारी कौल से उनकी शादी तो न हो सकी, लेकिन राजकुमारी की शादी के बाद भी दोनों संग-संग रहे। इस रिश्ते को दोनों ने कोई नाम नहीं दिया। अटल जी का कद राजनीति में इतना बड़ा था, विरोधी दल और मीडिया कभी उनकी जिंदगी में ताक-झांक न कर सके।”  

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40 के दशक में अटल जी और राजकुमारी हकसर, ग्वालियर में विक्टोरिया कॉलेज में पढ़ रहे थे। यह बात दीगर है, अब लक्ष्मीबाई कॉलेज कहा जाता है। दोनों ने एक-दूसरे की भावनाएं समझीं। विभाजन के उस दौर में किसी लड़के और लड़की के बीच की दोस्ती को सराहा नहीं जाता था। वाजपेयी और मिसेज कौल भी इस स्थिति से गुजर रहे थे। हालाँकि वाजपेयी जी ने अपनी भावनाओं का इजहार एक पत्र के माध्यम से किया, जिसे उन्होंने राजकुमारी के लिए लाइब्रेरी की एक किताब में रख दिया था। राजकुमारी ने भी ऐसे ही जवाब दिया, हालांकि उनका जवाब वाजपेयी जी तक पहुंचा ही नहीं।

भारत विभाजन के दौरान राजकुमारी के कश्मीरी पंडित पिता गोविंद नारायण हक्सर ने उनकी शादी कश्मीरी पंडित बृज नारायण कौल से कर दी। दरअसल, हक्सर अपनी बेटी की शादी एक शख्स यानी अटल जी से नहीं करना चाहते थे। वाजपेयी जी और राजकुमारी हक्सर दोनों अपनी जिंदगी में रम गए। बाद में मिसेज कौल पति के साथ दिल्ली चली गईं और वाजपेयी कानपुर की सियासी गलियों से होते हुए लखनऊ पहुंच गए। रामजस कॉलेज में मिसेज कौल के पति बीएन कौल दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे। बाद में वह रामजस हॉस्टल में वार्डन भी बने। कुछ सालों बाद अविवाहित वाजपेयी जी पूरी तरह से राजनेता बन गए। एक लंबे वक्त के बाद दिल्ली में अटल जी का मिसेज कौल से मिलना हुआ। दरअसल प्रो. कौल उस वक्त हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के प्लान में रोड़ा बन जाते थे, जब स्टुडेंट्स शराब पीने के लिए देर से हॉस्टल आने की योजना बनाते थे। ऐसे में छात्रों ने मिसेज कौल को शिकायत करने का प्लान बनाया। जब हॉस्टल में रहने वाले छात्रों का ग्रुप प्रो. कौल के घर शिकायत करने पहुंचा तो कहा जाता है कि उस वक्त उनका सामना अटल जी से हुआ।

सालों-साल तक अटल जी कौल के घर नियमित बेरोकटोक आने-जाने वालों में शामिल थे। बाद में अटल जी कौल हाउस में शिफ्ट हो गए जबकि उस वक्त तक प्रोफेसर कौल रामजस कॉलेज के वार्डन थे, लेकिन 1978 में अटल बिहारी वाजपेयी जब मोरारजी सरकार में विदेश मंत्री बने तो वे मिसेज कौल और उनकी बेटियों के साथ सरकारी आवास में शिफ्ट हो गए।  उन्होंने कौल की बेटी नमिता और बाद में उनकी दोहिती निहारिका को गोद ले लिया था। अटल जी के प्रधानमंत्री बनने तक वे उनके साथ ही रहे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक अंग्रेजी अख़बार को दिए इंटरव्यू में बताया था, ‘हम वाजपेयी जी के पड़ोस में रहते थे। घरों की दीवार से लगा एक दरवाजा था, जिससे कि दोनों परिवार के लोग आसानी से आ-जा सके। अटल जी मछली के शौकीन थे। नमिता अक्सर हमारे घर आती थी। मेरी पत्नी और मिसेज कौल की अच्छी बॉन्डिंग थी। जब नमिता की शादी तय हुई तो मेरी पत्नी ने तैयारी की थी, क्योंकि दूल्हा बंगाली था। बता दें कि नमिता की शादी रंजन भट्टाचार्य से हुई थी।

अमर लेखिका अमृता प्रीतम ने एक बार कहा था कि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो हर हाल में रहते हैं। स्वीकृति से जन्मते और कायम रहते तो ठीक था, लेकिन यह कई बार अस्वीकृति में से भी जन्म ले लेते हैं। सिर्फ जन्म ही नहीं लेते बल्कि इन्सान के साथ भी जीते हैं। मरने के बाद भी। एक ऐसा ही अटूट रिश्ता अटल जी और श्रीमती कौल के बीच था। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर के अनुसार ये खूबसूरत प्रेम कहानी थी। अटल जी और राजकुमारी कौल के बीच चला यह अपनापन खूबसूरत रिश्ते में बुनता चला गया। हर किसी को मालूम था, राजकुमारी कौल अटल जी के लिए सबसे प्रिय है।

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पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से एक बार सवाल पूछा गया था कि आप अब तक कुंवारे क्यों हैं? इसके जवाब में अपनी वाकपटु शैली में वाजपेयी जी ने पत्रकारों से कहा था कि मैं अविवाहित हूं , लेकिन कुंवारा नहीं हूं। वाजपेयी जी के इस बयान का मर्म चाहे जो भी निकाला जाए, लेकिन इस लोकप्रिय राजनेता की ज़िंदगी का एक अविस्मरणीय हिस्सा ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से जुड़ा रहा है। बताते हैं, अटल जी पर जनसंघ के सीनियर लीडर्स का दबाव था, वह इस रिश्ते से मोह छोड़ दें, लेकिन वह नहीं माने। अटल जी इस अटूट रिश्ते के प्रति आजीवन अटल रहे। वाजपेयी जी ने शादी भले ही नहीं की। हालांकि मिसेज कौल प्रधानमंत्री आवास में भी उनके साथ रहीं, लेकिन पत्नी की हैसियत से नहीं,दोस्त की खातिर। प्रधानमंत्री प्रोटोकॉल के हिसाब-किताब में उनका नाम नहीं था। वाजपेयी की आलोचना करने वाले नेताओं और दलों ने भी कभी इस नितांत निजी मसले को राजनीति के मैदान में नहीं घसीटा। यह प्रेम की एक ऐसी अलिखित कहानी थी और है, जिसे कोई नाम नहीं मिला।

-  प्रो. श्याम सुंदर भाटिया

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