खुद को एक्टिविस्ट या बुद्धिजीवी बताकर कानून को ठेंगा दिखाने वालों को बड़ा झटका लगा है

By नीरज कुमार दुबे | Jan 05, 2026

उच्चतम न्यायालय ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में आरोपियों- उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से साफ इंकार करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। अदालत ने साथ ही उमर खालिद और शरजील इमाम पर इस मामले में एक साल तक जमानत याचिका दाखिल करने पर भी रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने हालांकि इस मामले में अन्य आरोपियों- गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को 12 शर्तों के साथ जमानत दे दी है।

इसे भी पढ़ें: UAPA में जमानत क्यों मुश्किल? Supreme Court ने बताया Umar Khalid की भूमिका कैसे थी 'अलग और गंभीर'

देखा जाये तो उच्चतम न्यायालय का यह फैसला केवल दो व्यक्तियों की जमानत याचिका का निपटारा नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय संकल्प का स्पष्ट संदेश है। उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे लोग कोई साधारण आरोपी नहीं हैं। ये वे चेहरे हैं जिन्होंने विचारधारा की आड़ में सड़कों पर आग लगाने की मानसिकता को खाद पानी दिया। यह बार बार साबित हो चुका है कि दिल्ली दंगे अचानक नहीं भड़के थे। उनके पीछे शब्दों के बारूद, भाषणों की चिंगारी और योजनाबद्ध उकसावे की लंबी तैयारी थी। ऐसे मामलों में यदि अदालत नरमी दिखाती, तो यह न केवल न्याय के साथ अन्याय होता बल्कि समाज के लिए एक खतरनाक संकेत भी जाता।

अदालत ने सही कहा कि इन दोनों की स्थिति अन्य आरोपियों से अलग है। यह अंतर केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। दंगा केवल पत्थर फेंकने से नहीं होता, दंगा उस सोच से पैदा होता है जो समाज को बांटने का काम करती है। जब किसी मंच से यह कहा जाए कि सड़कों पर उतर कर व्यवस्था को जाम कर दो, तब वही शब्द बाद में आग बन जाते हैं। जमानत खारिज करने का फैसला उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो खुद को एक्टिविस्ट या बुद्धिजीवी बताकर कानून को ठेंगा दिखाना चाहते हैं। यह फैसला बताता है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब अराजकता फैलाने की छूट नहीं है।

मुकदमे में देरी को लेकर अदालत की टिप्पणी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वर्षों से एक तर्क गढ़ लिया गया था कि अगर मुकदमा लंबा चल रहा है, तो आरोपी को स्वतः राहत मिलनी चाहिए। यह सोच न्याय व्यवस्था को कमजोर करती है। अगर गंभीर साजिशों में केवल समय के आधार पर जमानत मिलने लगे, तो हर देश विरोधी ताकत समय को हथियार बना लेगी। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उपद्रवी और दंगाई मानसिकता वाले लोगों पर पड़ेगा। अब यह भ्रम टूटेगा कि लंबी कानूनी प्रक्रिया अंततः उन्हें बचा लेगी।

देखा जाये तो अदालत का सख्त रुख भारत की आतंकवाद के खिलाफ चल रही लडाई को मजबूत करता है। यह फैसला उन आम नागरिकों के लिए भी भरोसे का आधार है जिन्होंने दंगों में अपने घर, दुकानें और परिजन खोए। उनके लिए न्याय केवल सजा नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि सिस्टम उनके साथ खड़ा है। कुछ लोग इसे कठोरता कहेंगे, लेकिन सच यह है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए कठोर फैसले जरूरी होते हैं। 

उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज होना इस बात का प्रमाण है कि भारत की न्यायपालिका आज भी राष्ट्र की सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और संविधान की मूल भावना को समझती है। यह फैसला आने वाले समय में न केवल कानूनी मिसाल बनेगा, बल्कि उन सभी ताकतों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी होगा जो भारत को भीतर से तोड़ने का सपना देखती हैं। यह निर्णय बताता है कि भारत कमजोर नहीं है, भारत चुप नहीं है और भारत अब दंगों की राजनीति को बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Himanta Biswa Sarma ने Asom Gana Parishad के 42वें स्थापना दिवस पर दी बधाई

राहुल गांधी का कड़ा बयान: CJP नेताओं की गिरफ्तारी को बताया कायरतापूर्ण हरकत, जंतर-मंतर वापस हासिल करने का संकल्प

Delhi Voter List से कटे नाम जोड़ने और Form 6 के नियम से जुड़ी याचिका, Supreme Court 28 अक्टूबर को करेगा सुनवाई

NDMC ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण किया ऑनलाइन, 1931 से दर्ज पुराने हस्तलिखित रिकॉर्ड होंगे डिजिटल