Tukde Tukde Gang के जो लोग ढपली बजाते हुए देशविरोधी नारेबाजी करते हैं उन्हें समझना चाहिए कि उनकी विचारधारा का ढोल फट चुका है

By नीरज कुमार दुबे | Jan 06, 2026

सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार किए जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का परिसर एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। हम आपको बता दें कि जमानत याचिकाओं के खारिज होते ही जेएनयू के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर के भीतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक और विवादास्पद नारे लगाए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में सरकार विरोधी और उकसाने वाले नारों की गूंज साफ सुनी जा सकती है।


देखा जाये तो जेएनयू में टुकड़े टुकड़े गैंग एक बार फिर वही कर रहा है, जिसके लिए वह कुख्यात रहा है, खुलेआम देश की संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों को सड़कछाप नारों से चुनौती दी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय किसी सरकार का नहीं, बल्कि भारत के संविधान और कानून का निर्णय होता है। लेकिन टुकड़े-टुकड़े गैंग की सोच यहीं अटक जाती है। इनके लिए न्यायपालिका तब तक स्वीकार्य है, जब तक फैसला उनकी विचारधारा के अनुकूल हो। जब कोई अदालती फैसला इन्हें अपनी विचारधारा के विपरीत नजर आता है तब ये लोग “अभिव्यक्ति की आज़ादी” का ढोल पीटते हुए अराजकता पर उतर आते हैं।

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यह कोई संयोग नहीं है कि हर बार आतंकवाद, माओवाद या शहरी नक्सली नेटवर्क से जुड़े मामलों में सख्ती बढ़ती है, तो विश्वविद्यालयों के कुछ चुनिंदा कोनों से वही पुरानी स्क्रिप्ट निकल आती है। ढपली बजाते हुए टुकड़े टुकड़े गैंग से जुड़े लोग नारे लगाने लगते हैं, पोस्टरबाजी करने लगते हैं और सरकार को कोसने का सुनियोजित अभियान चलाने लगते हैं। सवाल यह नहीं है कि नारे किसके खिलाफ लगाए गए, सवाल यह है कि आखिर देश के भीतर रहकर देश की न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने की यह मानसिकता कब तक बर्दाश्त की जाएगी?


टुकड़े टुकड़े गैंग को समझना होगा कि आज का भारत 1990 या 2000 का भारत नहीं है। यह वही भारत है जिसने कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ी, माओवाद को खत्म करने की राह पर है और उग्रवाद को समाप्त कर दिया है। सुरक्षा बलों की स्पष्ट रणनीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनता के समर्थन ने यह साफ कर दिया है कि हिंसा और षड्यंत्र की राजनीति का अब कोई भविष्य नहीं है। ऐसे में “अर्बन नक्सल” खेमे की बौखलाहट स्वाभाविक है।


जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्र को दिशा देने वाले विचार गढ़े, न कि देश को तोड़ने वाली सोच का अड्डा बने। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ छात्र संगठन वैचारिक असहमति की आड़ में वही एजेंडा आगे बढ़ाते दिखते हैं, जो भारत को अस्थिर करना चाहता है। यह न तो क्रांति है, न ही प्रतिरोध, यह केवल हताशा है। ऐसे लोगों को समझना होगा कि भारत अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां कानून अपने रास्ते से नहीं डिगेगा। न सुप्रीम कोर्ट दबाव में आएगा, न सरकार ब्लैकमेल होगी और न ही देश की जनता इन नारों के भ्रमजाल में फंसेगी। टुकड़े-टुकड़े गैंग चाहे जितना शोर मचा ले, उनकी सोच हकीकत नहीं बन सकती। नया भारत आतंकवाद, माओवाद और उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के अंतिम चरण में है और इस यात्रा को कुछ नारों से रोका नहीं जा सकता।


जहां तक जेएनयू में हुई विवादित नारेबाजी की बात है तो आपको यह भी बता दें कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। एक ओर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने दावा किया है कि ये नारे “वैचारिक” थे और किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य कर नहीं लगाए गए। उन्होंने कहा कि पांच जनवरी 2020 को परिसर में हुई हिंसा की याद में हर वर्ष छात्र विरोध प्रदर्शन करते हैं। वहीं, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा ने टुकड़े टुकड़े गैंग पर जोरदार तरीके से धावा बोला है।

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