Gyan Ganga: रावण को किसके सद्गुणों के बारे में अंगद समझा रहे थे?

By सुखी भारती | Aug 01, 2023

श्रीरामचरित मानस में वर्णित कोई भी चौपाई, पद अथवा सोरठा, या एक साधारण-सी दिखने वाली पंक्ति भी व्यर्थ भाव में नहीं लिखी गई है। इस महान पवित्र ग्रंथ में निहित संपूर्ण ज्ञान, मानव जाति के उत्थान के लिए ही लिपिबद्ध किया गया है। तभी तो वीर अंगद द्वारा रावण को, दिए जा रहे, चौदह मृत लोगों वाले उपदेस को, रावण के माध्यम से संपूर्ण जगत को दिया जा रहा है। कारण कि रावण का तो उसी समय ही निश्चित था, कि उसे तो संसार से अपयश कमा कर चले जाना है। लेकिन आने वाले भविष्य में असंख्य ही ऐसी पीढ़ियां आने वाली हैं, जो या तो श्रीराम जी के पथ मार्गी होंगे, या फिर, वे रावण के कुमार्ग को अंगीकार करेंगे। अगर वे रावण के पथ को पाने वाले होंगे, तो उन्हें कम से कम यह जानकारी तो होगी, कि अगर हम ऐसे चौदह प्रकार के लोगों को अपने समक्ष पायेंगे, तो महापुरुषों ने तो उन्हें पहले ही मृत की संज्ञा में रखा हुआ है। ऐसे में संभव है, कि जीव संभलने का प्रयास करेगा। क्योंकि कोई भी व्यक्ति स्वयं को कभी भी, जीते जागते मृत कहलाना पसंद नहीं करेगा।

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‘साधु कहाना कठिन है, ज्यों लंबी पेड़ खजूर।

चढे़ तो चखे प्रेम रस, गिरे तो चकनाचूर।।’

अंत में वीर अंगद कहते हैं-

‘तनु पोषक निंदक अघ खानी।

जीवत सव चौदह प्रानी।।’

आपने संसार में देखा होगा, कि कुछ लोगों को केवल अपने तन के सुखों तक ही मतलब होता है। वे केवल अपने पेट के ही सगे होते हैं। उनके समक्ष कोई कितने भी अभाव में ही क्यों न हो, उनका हृदय रत्ती भर भी द्रवित नहीं होता। हमारे गुरु जनों ने लंगर की प्रथा इसीलिए तो आरम्भ की थी। कारण कि हम सब मिल कर भूखे-प्यासों की सहायता करें।

बारहवें स्थान पर वीर अंगद ने पराई निंदा करने वालों को रखा। उन्होंने कहा कि जो लोग कभी अपने चरित्र का अवलोकन न करके, सदैव दूसरों के चरित्र पर ही लाँछन लगाते रहते हैं। उनकी निंदा करते रहते हैं, उन्हें भी मरा ही समझना चाहिए। और अंत में कहा कि जो लोग पापों की खान होते हैं। अर्थात किसी भी अवगुण से रहित नहीं होते, वे भी मरे ही होते हैं।

आगे रावण वीर अंगद की बातों पर क्या प्रतिक्रिया देता है, जानेंगे अगले अंक में---

-सुखी भारती

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