Vanakkam Poorvottar: Annamalai ने केंद्र के एक फैसले का कर दिया विरोध, PM Modi और CM Vijay रह गये हैरान

By नीरज कुमार दुबे | May 28, 2026

जनहित के लिए सरकार की आलोचना करने में भाजपा नेता के. अन्नामलाई यह नहीं देखते कि वह अपनी ही पार्टी की केंद्र सरकार को घेर रहे हैं। इन दिनों वह तमिलनाडु की विजय सरकार के साथ ही केंद्र को भी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। उनके दो ताजा बयान इस बात का संकेत हैं कि तमिलनाडु की राजनीति में वह केवल दलगत सीमाओं तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को उठाकर अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं। चाहे मामला भाषा नीति का हो या फिर विद्यालयों में बच्चों को दिए जाने वाले मध्यान्ह भोजन का, अन्नामलाई ने दोनों ही विषयों पर खुलकर सवाल उठाए हैं।

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अन्नामलाई ने कहा कि यह फैसला विशेष रूप से तमिलनाडु के अभिभावकों के लिए झटके जैसा है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों पर अचानक नई भाषा थोपने से बच्चों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और उनकी पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पहले केंद्र ने स्वयं वर्ष 2029-30 से इस व्यवस्था को लागू करने का आश्वासन दिया था। इसलिए सरकार को अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान करना चाहिए।

अन्नामलाई का यह रुख इसलिए अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अब तक वह नई शिक्षा नीति और तीन भाषा व्यवस्था के प्रबल समर्थक रहे हैं। जब भी द्रविड मुनेत्र कषगम और पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया, तब तब अन्नामलाई ने आक्रामक तरीके से केंद्र का बचाव किया। ऐसे में अब उनका सार्वजनिक विरोध राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हम आपको बता दें कि तमिलनाडु में भाषा का मुद्दा हमेशा संवेदनशील रहा है। 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनों ने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी थी। द्रविड दलों ने इसी आधार पर दशकों तक अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम रखा। आज भी यदि कोई कदम तमिल पहचान पर हमले की तरह दिखाई देता है, तो वह तुरंत राजनीतिक और भावनात्मक विवाद बन जाता है। द्रविड मुनेत्र कषगम और अन्ना द्रविड मुनेत्र कषगम लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी को उत्तर भारत की पार्टी बताकर तमिल पहचान के लिए खतरा बताती रही हैं।

अन्नामलाई ने तमिलनाडु की राजनीति में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी की छवि को स्थानीय रंग देने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य यह दिखाना रहा कि पार्टी केवल बाहरी विचारधारा नहीं बल्कि तमिल आकांक्षाओं की भी प्रतिनिधि बन सकती है। लेकिन नई शिक्षा नीति और भाषा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर यह संतुलन कठिन हो जाता है। यदि पार्टी खुलकर तीन भाषा व्यवस्था को आगे बढ़ाती है, तो विरोधी दल हिंदी थोपने का आरोप और तेज कर देते हैं। यही कारण है कि अन्नामलाई ने नीति का विरोध करने की बजाय उसके क्रियान्वयन के तरीके पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समस्या बहुभाषी शिक्षा नहीं बल्कि जल्दबाजी और प्रशासनिक दबाव है।

इस बीच इस विवाद ने न्यायिक मोड़ भी ले लिया है। उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत कक्षा नौ में लागू की गई नई तीन भाषा व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने दोनों पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई पंद्रह और सोलह जुलाई को होगी। इससे स्पष्ट है कि भाषा विवाद अब केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक बहस का भी विषय बन गया है।

खास बात यह है कि अन्नामलाई के बयानों का समय भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालिया तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। पार्टी केवल एक सीट जीत सकी जबकि उसकी सहयोगी अन्ना द्रविड मुनेत्र कषगम को 47 सीटें मिलीं। चुनाव से पहले ही अन्ना द्रविड मुनेत्र कषगम नेतृत्व ने कथित तौर पर अन्नामलाई को किनारे करने की मांग की थी ताकि दोनों दलों के बीच गठबंधन आसान हो सके। बाद में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और विधानसभा चुनाव में भी मैदान में नहीं उतारा। पार्टी नेतृत्व ने कहा कि संगठन में उनकी क्षमताओं का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर किया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार अन्नामलाई स्वयं भी इस बात से असहज थे कि पार्टी अन्ना द्रविड मुनेत्र कषगम पर अत्यधिक निर्भर दिखाई दे। उनका मानना था कि भारतीय जनता पार्टी को तमिलनाडु में स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित होना चाहिए। चुनावी हार के बाद राज्य इकाई के संगठन और नेतृत्व को लेकर भी मंथन शुरू हो गया है। दिल्ली में पार्टी के भविष्य और नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं जारी हैं। ऐसे माहौल में अन्नामलाई के बयान राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखे जा रहे हैं।

हम आपको यह भी बता दें कि भाषा विवाद के साथ-साथ अन्नामलाई ने तमिलनाडु सरकार की मध्यान्ह भोजन योजना पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ठेकेदारों ने मार्च महीने में अंडों की कीमत घटने पर लगभग बीस करोड़ अंडे खरीदकर शीत भंडारण में जमा कर लिए थे ताकि उन्हें पूरे वर्ष विद्यालयों में आपूर्ति किया जा सके। उस समय अंडों की कीमत घटकर तीन रुपए सत्तर पैसे प्रति अंडा हो गई थी जबकि सरकार योजना के तहत पांच रुपए तिरसठ पैसे प्रति अंडा देती है।

अन्नामलाई ने चेतावनी दी कि लंबे समय तक शीत भंडारण में रखे गए अंडों की गुणवत्ता, पोषण और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह केवल खरीद प्रक्रिया का मामला नहीं बल्कि लाखों बच्चों के स्वास्थ्य और अभिभावकों के भरोसे का प्रश्न है। हम आपको बता दें कि तमिलनाडु में पहले भी मध्यान्ह भोजन में सडे अंडों की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। राज्य में प्रतिदिन लगभग चालीस लाख से अधिक विद्यार्थी पोषण आहार योजना का लाभ उठाते हैं। ऐसे में यदि भोजन की गुणवत्ता पर लापरवाही हुई तो उसका असर व्यापक होगा।

अन्नामलाई ने साफ कहा कि बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता में किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। इस तरह उनके इन बयानों से स्पष्ट है कि वह केवल विपक्षी राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि तमिलनाडु में खुद को जनहित के मुद्दों पर मुखर नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि वह कभी राज्य सरकार को घेरते हैं तो कभी अपनी ही पार्टी की केंद्र सरकार पर सवाल उठाने से भी पीछे नहीं हटते।

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