CWG Gold Winner Arundhati Choudhary को बुखार भी नहीं रोक सका, लेकिन Rajasthan Govt की बेरुखी से हैं आहत

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Aug 02, 2026

 राजस्थान की पहली मुक्केबाज अरुंधति चौधरी को इस बात की निराशा है कि राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने कि ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के बावजूद उन्हें अब तक राज्य सरकार की ओर से किसी तरह का प्रोत्साहन या शुभकामना संदेश नहीं मिला है। अरुंधति ने महिलाओं के 70 किग्रा वर्ग के फाइनल में इंग्लैंड की शेंटेले रीड को 5-0 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि उनके परिवार के त्याग और अपने राज्य के लिए इतिहास रचने की प्रेरणा का परिणाम है। उन्होंने कहा कि खेलों के लिए आने के बाद उन्हें पता चला कि वह राष्ट्रमंडल खेलों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला मुक्केबाज हैं।

राजस्थान में मुक्केबाजी के ढांचे पर निराशा जताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘राजस्थान में इस तरह के खेलों के लिए कोई खास सुविधा नहीं है। मुझे पदक जीते हुए काफी समय हो गया है, लेकिन अभी तक राज्य सरकार या खेल मंत्री की ओर से कोई शुभकामना या प्रोत्साहन नहीं मिला है।’’ राजस्थान के कोटा जिले की इस खिलाड़ी ने कहा, ‘‘वहां (राजस्थान) से जो खिलाड़ी आगे आ रहे हैं, वे अपने दम पर आ रहे हैं। कोटा में भी मुक्केबाजी के लिए कोई खास सुविधा नहीं है। जब मैं वहां जाती हूं तो क्रिकेट के मैदान में अभ्यास करना पड़ता है। इसी कारण मैं भारतीय सेना से जुड़ी और वहीं की सुविधाओं का उपयोग कर प्रशिक्षण ले रही हूं।’’ अरुंधति को मुक्केबाज बनाने के सफर में परिवार का पूरा साथ मिला और इन खेलों में जब उनका मुकाबला शुरु होने से पहले से ही उनके पिता ने उपवास रखा जो उनके स्वर्ण पदक जीतने पर टूटा।

अरुंधति ने कहा, ‘‘राष्ट्रमंडल खेलों में जब मैंने अपना पहला मुकाबला जीता था, तब मेरी बड़ी बहन ने बताया कि मेरे पिता मेरे स्वर्ण पदक जीतने के लिए उपवास रख रहे हैं। इसके बाद मैं स्वर्ण पदक जीतने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हो गई। मुझे अपने राज्य के लिए भी कुछ करना था। परिवार का मुझे पूरा सहयोग मिला।’’ इस मुकाबले से पहले अरुंधति को तेज बुखार था लेकिन उन्होंने कहा कि इतने बड़े मंच पर खिलाड़ियों को अपने शरीर की परेशानियों को पीछे छोड़कर प्रदर्शन करना पड़ता है।

उन्होंने कहा, ‘‘इतने बड़े मंच पर खुद को साबित करने का मौका बहुत लंबे समय बाद मिलता है। ऐसे में चोट, वजन कम करना या बीमार होना बहाने नहीं हो सकते। ये सब चीजें बाद में ठीक हो जाएंगी, लेकिन अगर पदक हाथ से निकल गया तो वह वापस नहीं आएगा। राष्ट्रमंडल खेलों में अगला मौका चार साल बाद ही मिलता है।’’

अरुंधति ने कहा, ‘‘‘मैंने फाइनल मुकाबले से कुछ समय पहले बुखार कम करने के लिए पैरासिटामोल ली थी, लेकिन जैसे ही रिंग में उतरी, सब कुछ भूल गई। वहां बड़ी संख्या में भारतीय दर्शक मौजूद थे। ‘इंडिया-इंडिया’ और ‘जय बजरंग बली’ के नारों ने मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा दिया और उसी ऊर्जा के साथ मैंने मुकाबला खेला।’’ भारतीय मुक्केबाजों ने राष्ट्रमंडल खेलों में सात स्वर्ण और तीन रजत पदक जीत कर इतिहास रच दिया।

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