By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 04, 2026
नयी दिल्ली, चार अगस्त मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा है कि शिक्षा क्षेत्र में अनियमितताओं को लेकर दिल्ली में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में हुए छात्रों के विरोध-प्रदर्शन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो दशक से ज्यादा समय में बनी सार्वजनिक छवि को महज दो हफ्ते में “ध्वस्त” कर दिया और उन्हें ऐसा राजनीतिक झटका दिया, जो “किसी भी चुनावी जीत से कहीं बड़ा” है। अरुंधति ने सोमवार को अपनी किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के हिंदी अनुवाद संस्करण ‘मेरी मां, मेरी गैंगस्टर’ के विमोचन के मौके पर कहा कि चुनावी हार-जीत सिर्फ राजनीति का एक पहलू है और हाल में हुए जन-आंदोलनों ने दिखा दिया है कि दशकों में गढ़े गए विमर्श की चूलों को भी कुछ ही हफ्तों में हिलाया जा सकता है। उन्होंने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में खचाखच भरे सभागार में कहा, “मुझे सबसे अच्छी बात यह लगती है कि किसी को नहीं पता कि हमारा, देश का क्या होगा।
अरुंधति ने विपक्षी दलों से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले लोगों से सीख लेने का भी अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वहां मौजूद युवा प्रतिभागियों ने “समझदारी” का परिचय दिया, भले ही वे शायद हर मुद्दे पर एक-दूसरे से सहमत न हों। अरुंधति ने कहा, “प्रदर्शनकारियों ने अपनी भूमिका बहुत जिम्मेदारी से निभाई।” उन्होंने प्रदर्शनकारियों के बीच तालमेल की तुलना संगीत बैंड के सदस्यों से की और कहा कि हर व्यक्ति की भूमिका अलग-अलग थी, लेकिन सभी एक ही मकसद के लिए योगदान दे रहे थे।
अरुंधति ने कहा, “गिटार वादक गायक नहीं हो सकता, गायक ड्रम वादक नहीं हो सकता, ड्रम वादक गिटार वादक नहीं हो सकता... उन सभी ने अपनी भूमिकाएं अलग-अलग तरह से निभाई हैं। अब बड़ों को भी समझदारी दिखानी होगी।” अरुंधति ने पिछले दो दशक में ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ समेत कई गैर-गल्प किताबें और विभिन्न विषयों पर ढेर सारे निबंध भी लिखे हैं। इन विषयों में कश्मीर, बड़े बांध, वैश्वीकरण, दलित नेता डॉ. बीआर आंबेडकर, माओवादी विद्रोहियों से मुलाकात और व्हिसलब्लोअर एडवर्ड स्नोडेन तथा हॉलीवुड अभिनेता जॉन क्यूसैक के साथ उनकी बातचीत शामिल हैं।
पेन पिंटर पुरस्कार विजेता लेखिका के काम को उनके प्रशंसक बहुत सम्मान देते हैं, जबकि आलोचक लगभग हमेशा ही उनकी कड़ी आलोचना करते रहे हैं। अरुंधति के लेखन पर कई बार तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं और इनके कारण उन्हें कानूनी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा है। प्रभात सिंह द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘मेरी मां, मेरी गैंगस्टर’ अरुंधति और उनकी मां मैरी रॉय के बीच के मुश्किल रिश्तों पर आधारित है।
मैरी रॉय एक जानी-मानी शिक्षिका और महिला अधिकार कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने केरल की सीरियाई ईसाई महिलाओं को उनके पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिलाने वाला ऐतिहासिक मुकदमा लड़ा था। अरुंधति ने दावा किया कि यह किताब “न तो उनकी आत्मकथा है और न ही उनकी मां की जीवनी”, बल्कि यह दो महिलाओं के “रिश्ते की कहानी” है, जो संयोग से मां और बेटी थीं। उन्होंने किताब में अपनी मां का जिक्र ‘गैंगस्टर’ के रूप में किए जाने की वजह भी बताई।
अरुंधति ने कहा, “कुछ लोग, संभवत: हिंदी भाषी क्षेत्र के लोग, इस बात से नाराज हो जाते हैं कि मैंने अपनी मां को ‘गैंगस्टर’ कहा। लेकिन आलोचना करने वाले और मेरा बचाव करने वाले, दोनों ही असल बात को नहीं समझ पा रहे हैं। आलोचक कहते हैं, ‘आप अपनी मां को गैंगस्टर कैसे कह सकती हैं?’ दूसरी तरफ, मेरा बचाव करने वाले कहते हैं, ‘वह बहुत ज्यादा रक्षात्मक थीं।’ दोनों ही गलत हैं।
वह एक गैंगस्टर ही थीं।” उन्होंने कहा, “और सच कहूं तो, जब भी मुझ पर हमला होता है---जैसा कि आजकल हर किसी के साथ होता है---तो मैं खुद से कहती हूं, ‘क्या तुम्हें पता है, मेरी मां कौन हैं? क्या तुम्हें पता है, मैं किसकी बेटी हूं? तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगे?” अरुंधति ने ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के ‘कोलैटरल’ अध्याय का जिक्र करते हुए अपने बचपन की एक घटना साझा की, जब उनकी मां ने आधी रात को उनके भाई को नींद से जगाकर स्केल से पीटा, क्योंकि वह एक ऐसा रिपोर्ट कार्ड घर लाया था, जिसमें उसे ‘औसत छात्र’ बताया गया था।
उन्होंने बताया कि अगली सुबह अच्छे अंक लाने के लिए उन्हें गर्मजोशी से गले लगाकर शाबाशी दी गई। अरुंधति के मुताबिक, इस घटना ने सफलता और विशेषाधिकार के बारे में उनकी समझ पर गहरा असर डाला। उन्होंने किताब में लिखा, “तब से मेरे लिए हर निजी कामयाबी के साथ एक तरह की आशंका भी जुड़ी होती है।
जब भी मेरी तारीफ होती है या तालियां बजती हैं, तो मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि किसी और को-किसी शांत व्यक्ति को-दूसरे कमरे में पीटा जा रहा है।” अरुंधति ने उस घटना को याद करते हुए कहा कि तब से “दूसरा कमरा” उनके लेखन का मुख्य हिस्सा बन गया। उन्होंने कहा, “लोग सोचते हैं कि मैं एक सफल लेखिका हूं, पर मैं ऐसी नहीं हूं। वे मेरा सम्मान करते हैं, मुझे पुरस्कार देते हैं, मुझे बुकर पुरस्कार देते हैं... लेकिन ‘दूसरे कमरे’ में किसी को पीटा जा रहा होता है।
मेरा सारा लेखन इसी बारे में है।” अरुंधति ने कहा कि हर जगह “किसी न किसी को पीटा जा रहा है”---“गाजा में, बस स्टैंड पर, किसी गांव में, जंतर-मंतर पर”--- और उनके काम ने हमेशा उन लोगों की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है, जो व्यक्तिगत सफलता के सार्वजनिक जश्न के बावजूद अनदेखे रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि अब नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे अन्याय को सामान्य माने जाने का विरोध करें। अरुंधति ने कहा, “अब हमें दिखाना होगा कि हम और मार नहीं खाएंगे।” उनकी इस बात पर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
‘मेरी मां, मेरी गैंगस्टर’ की कीमत 577 रुपये है और यह ऑनलाइन तथा ऑफलाइन दोनों उपलब्ध है। किताब के अंग्रेजी संस्करण का अनुवाद पहले ही 40 से ज्यादा भाषाओं में किया जा चुका है, जिनमें सभी यूरोपीय भाषाएं, जापानी, चीनी और मंगोलियाई शामिल हैं।