By नीरज कुमार दुबे | Jan 07, 2026
दिल्ली में नगर निगम की टीम जब अदालत के स्पष्ट आदेश पर अतिक्रमण हटाने पहुंची, तभी से एक संगठित प्रयास शुरू हो गया कि इस प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक टकराव में बदला जाए। घटना तुर्कमान गेट इलाके की है, जहां एक मस्जिद के आसपास लंबे समय से अवैध निर्माण और अतिक्रमण चला आ रहा था। मामला अदालत में पहुंचा और अदालत ने साफ निर्देश दिए कि अवैध ढांचों को हटाया जाए। इसी आदेश के पालन में एमसीडी का दल पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचा। न तो यह अचानक की गई कार्रवाई थी और न ही किसी धर्म विशेष को निशाना बनाने की योजना थी। यह एक कानूनी प्रक्रिया थी, जो अदालत की निगरानी में चल रही थी।
लेकिन जैसे ही बुलडोजर चले, वैसे ही राजनीति का इंजन गरजने लगा। समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिब्बुल्ला नदवी मौके पर पहुंच गए। सवाल यह है कि जब मामला अदालत और प्रशासन के बीच है, तो एक सांसद को बीच में कूदने की क्या जरूरत थी? उनकी मौजूदगी ने माहौल को शांत करने की बजाय और भड़का दिया। देखते ही देखते भीड़ जमा हुई, नारेबाजी शुरू हुई और फिर वही हुआ जो अक्सर ऐसे मामलों में होता है, यानि पत्थर चले और पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा।
इसके बाद शुरू हुआ बयानबाजी का खेल। कुछ मौलाना और विपक्षी नेता मैदान में उतर आए और बिना तथ्य जाने इसे मुस्लिमों पर हमला बताने लगे। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी हायतौबा मचाते हुए इसे मुस्लिम उत्पीड़न का मामला करार दे दिया। सवाल यह है कि अगर सच में मस्जिद पर कार्रवाई हुई होती तो प्रशासन इसे कैसे छुपा पाता? हकीकत यह है कि मस्जिद को हाथ तक नहीं लगाया गया।
दिल्ली के गृह मंत्री आशीष सूद ने पूरे मामले पर बेहद स्पष्ट और दो टूक बयान दिया। उन्होंने कहा कि मस्जिद पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, यहां तक कि मस्जिद की चौखट की मिट्टी तक नहीं हटाई गई। सिर्फ और सिर्फ अतिक्रमण को हटाया गया है। यानी जो अवैध था, वही ढहाया गया। इसके बावजूद कुछ लोग जानबूझकर अफवाह फैला रहे हैं कि धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाया गया।
देखा जाये तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अतिक्रमण हटाना अब अपराध हो गया है? क्या अदालत के आदेश का पालन करना साम्प्रदायिकता कहलाएगा? सच्चाई यह है कि कुछ राजनीतिक दलों और धार्मिक ठेकेदारों को बवाल से फायदा होता है।
दिल्ली की घटना में भी वही हो रहा है। एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को जानबूझकर मुस्लिम बनाम सरकार के फ्रेम में ढाला जा रहा है। इसका मकसद साफ है, भीड़ को उकसाना, भावनाएं भड़काना और राजनीतिक जमीन तैयार करना। यह समझना जरूरी है कि अतिक्रमण चाहे किसी भी धर्म के नाम पर हो, वह अतिक्रमण ही होता है। अगर मस्जिद के आसपास अवैध दुकाने, हॉल या दीवारें बनी हैं तो उन्हें हटाना कानून की जिम्मेदारी है। प्रशासन यह नहीं देख सकता कि अवैध निर्माण किस समुदाय से जुड़ा है। अगर ऐसा होने लगे तो फिर कानून का मतलब ही खत्म हो जाएगा।
इस पूरे प्रकरण में पत्थरबाजी और हिंसा ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। अगर यह सच में अन्याय के खिलाफ विरोध था, तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन क्यों नहीं हुआ। पुलिस पर हमला किस बात का समाधान है। सच्चाई यह है कि जब तर्क कमजोर पड़ते हैं, तब पत्थर चलाए जाते हैं। अब जरूरत इस बात की है कि शोर और झूठे नारों से ऊपर उठकर तथ्य देखे जाएं। मस्जिद सुरक्षित है, धार्मिक स्थल को कोई नुकसान नहीं हुआ, सिर्फ अतिक्रमण हटा है। इसके बावजूद अगर इसे उत्पीड़न कहा जा रहा है, तो यह नासमझी नहीं बल्कि सोची समझी राजनीति है।