1 घंटा 21 मिनट 46 सेकेंड और 22 पन्नों की कहानी, तलाक पर SC ने क्या नया ऑर्डर दे दिया, पलट जाएगा अतुल केस का फैसला?

By अभिनय आकाश | Dec 14, 2024

एक घंटा 21 मिनट और 46 सेकेंड की कहानी खुद उसी शख्स की जुबानी सामने आई जिसने देश दुनिया को झकझोर कर रख दिया। पहले वो 81 मिनट तक अपनी कहानी सुनाता है और फिर 23 पन्नों में अपनी कहानी लिखता भी है। उसने अपनी कहानी सुनाई और इसे लिखा भी फिर आखिर में हरेक को अलविदा कह दिया। सुनने वाले को शुक्रिया कहता है और फिर ये भी कहता है कि आप सब जो फिल्म देख रहे हैं आप सभी का कल्याण हो। फिर वो मौत को गले लगा लेता है। अतुल सुभाष 34 साल का एक इंजीनियर जिसकी बैंगलुरू के एक कमरे के अंदर पंखे से झूलती लाश मिली उसके बाद से पूरे देश में इसकी चर्चा है। चर्चा अतुल के नाम की नहीं हो रही है। बल्कि चर्चा इस बात पर हो रही है कि एक पति की मौत और उसकी मौत के बाद उठता शोर। जान देने से पहले अतुल सुभाष ने अपनी पत्नी, अपनी सास और जौनपुर फैमिली कोर्ट में तैनात जज रीता कौशिक पर जान देने के लिए उकसाने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। साल 2021 में अतुल और उसकी पत्नी निकिता सिंघानिया में मध्यस्थता की एक कोशिश फेल हो गई थी। इस साल निकिता और उसके परिजनों ने अतुल के परिवार से बिहार के समस्तीपुर में मध्यस्थता की कोशिश की। कोशिश ये कि अतुल और निकिता के बीच चल रहे विवाद को सुलझाया जाए। पती-पत्नी आपसी सहमति से अलग होने पर राजी हो जाए। दोनों परिवारों के  बीच बातचीत हुई थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार निकिता का परिवार 22 लाख रुपये की एकमुश्त राषि पर अलग होने को राजी हो गया था। दावों के मुताबिक ये पूरी बातचीत समस्तीपुर के चार्टेड एकाउंटेंट पंकज ज्योति के घर पर हुई थी। बातचीत के दौरान अतुल लगातार अपने पिता से फोन पर बात करते रहे। 

दहेज केस में फंसाने की प्रवृत्ति बड़ी

सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा है कि दहेज प्रताड़ना मामले में अदालतों को सावधानी रखनी चाहिए ताकि कानून के गलत इस्तेमाल को रोका जा सके। जो लोग भी निर्दोष हैं उन्हें बेवजह परेशानियों से बचाया जा सके। शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि पति के परिजनों को फंसाने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। अदालत ने FIR खारिज करने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि वैवाहिक विवाद में पति के परिवार के सदस्यों को बिना कारण उनकी संलिप्तता के बिना उनके नाम को शामिल करने को शुरू में ही रोका जाना चाहिए। जब भी वैवाहिक विवाद शुरू होता है तो कई बार पति के पूरे परिवार को फंसाने की प्रवृत्ति होती है। आरोप सामान्य से होते हैं और उसके पक्ष में ठोस सबूत नहीं होते हैं। यह क्रिमिनल केस का आधार नहीं बन सकता है। ऐसी स्थिति में अदालतों को सावधानी रखनी चाहिए ताकि कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग को रोका जा सके।

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पत्नी को वैसा ही जीवन देना होगा

सीआरपीसी, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू अडॉप्शन ऐंड मेंटिनेंस ऐक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारे भत्ते की मांग की जा सकती है। हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक के समय एकमुश्त या महीने के हिसाब से गुजारा भत्ता दिए जाने का प्रावधान है। कोई फॉर्म्युला नहीं है कि कैसे गुजारा भत्ता तय होगा। ये पार्टियों के स्टेटस पर निर्भर है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिर साफ किया है कि पत्नी का ससुराल में जो लाइफ स्टाइल था, वही मेनटेन करना होगा।

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