Indian Economy पर गहराता Balance of Payments संकट, जानिए क्यों RBI के हस्तक्षेप के बाद भी रुपया है Under Pressure

By Ankit Jaiswal | Jul 29, 2026

भारतीय रुपये में इस साल लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। वर्ष की शुरुआत से अब तक रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले छह प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से रुपये को सहारा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए, लेकिन उनका असर अभी तक सीमित ही दिखाई दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और वैश्विक दोनों कारणों से रुपये पर दबाव बना हुआ है।

इन उपायों के बाद रुपया कुछ समय के लिए मजबूत हुआ और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 94 के स्तर तक पहुंच गया। हालांकि यह मजबूती ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी और रुपया फिर से लगभग 96 के आसपास पहुंच गया। मौजूद जानकारी के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि इन कदमों का मुख्य उद्देश्य रुपये को तेज़ी से मजबूत करना नहीं, बल्कि विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाना और भुगतान संतुलन को बेहतर बनाना है।

विशेषज्ञों के अनुसार रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण भुगतान संतुलन में लगातार बना हुआ घाटा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का भुगतान संतुलन 23.6 अरब डॉलर के घाटे में रहा, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह घाटा केवल 5.03 अरब डॉलर था। इसके अलावा पूंजी खाते में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह कमजोर हुआ और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना।

गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष 2013 के बाद पहली बार विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमा से जुड़े विशेष उपाय दोबारा लागू किए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में इन योजनाओं के जरिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत आ सकती है। कुछ जानकारों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात सामान्य रहे तो अगले कुछ महीनों में रुपया धीरे-धीरे 93 से 94 प्रति डॉलर के दायरे तक मजबूत हो सकता है।

हालांकि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि विदेशी पूंजी आने के बाद भी रुपये में बहुत अधिक मजबूती देखने को नहीं मिलेगी। इसकी वजह यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक अतिरिक्त डॉलर खरीदकर देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की रणनीति अपनाता है। इससे रुपये में अत्यधिक तेजी नहीं आती और निर्यात क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बनी रहती है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने हाल के महीनों में ऋण बाजार में अच्छी खरीदारी की है, लेकिन शेयर बाजार से निकासी का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुका है। ऐसे में कुल विदेशी पूंजी प्रवाह अभी भी उम्मीद के अनुरूप मजबूत नहीं माना जा रहा है।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिकी डॉलर की मजबूती रुपये सहित अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बनाए हुए है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति, ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदें और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में अमेरिकी डॉलर को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे उभरते देशों की मुद्राओं में निवेश सीमित हो रहा है।

इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक के अग्रिम विदेशी मुद्रा सौदों की बड़ी स्थिति भी रुपये की तेज मजबूती में बाधा मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बैंक भविष्य की जरूरतों और बाहरी दायित्वों को ध्यान में रखते हुए विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने पर अधिक ध्यान दे रहा है।

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