By अभिनय आकाश | May 09, 2026
भारत और नेपाल के बीच का विवाद अभी थमता हुआ नहीं दिख रहा है। जहां पहले नेपाल की बालेन सरकार ने मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर प्रोटेस्ट नोट जारी किया था। जिसके जवाब में भारत ने भी कड़ा जवाब नेपाल को दिया था और इन सबके बीच एक बार फिर नेपाल के भीतर से लिपुलेख को लेकर मांग उठने लगी है। दरअसल नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली विपक्ष ने प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार पर सीधा दबाव बनाया है कि वह भारत और चीन के साथ सिर्फ डिप्लोमेटिक नोट्स यानी कि प्रोटेस्ट नोट जैसी कूटनीतिक चिट्ठियों का आदानप्रदान बंद करें और सीधे टेबल टॉक यानी उच्च स्तरीय बातचीत करें लिपुलेख के मुद्दे पर। यानी अब नेपाल का विपक्ष भी लिपुलेख के मुद्दे पर ऐसे सवाल उठा रहा है। इस विवाद की ताजा वजह है कैलाश मानसरोवर यात्रा और उसको लेकर नेपाल के द्वारा उठाया गया विरोध। हाल ही में भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के रास्ते इस पवित्र यात्रा की घोषणा की थी। जिसके बाद नेपाल सरकार ने इस पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों को ही राजनीयिक नोट भेज दिया था। जिसमें नेपाल का दावा था कि बिना उसकी सहमति के इस रास्ते का उपयोग नहीं किया जा सकता।
भारत ने नेपाल के नक्शे के विस्तार को कृत्रिम और एकतरफ़ा बताया है यानी बनावटी। भारत ने साफ कहा है कि वह बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन किसी भी तरह के अनुचित दबाव या ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ को स्वीकार नहीं किया जाएगा। लिपुलेखक, लिंपियादुरा और कालापानी ये तीनों इलाके भारत, नेपाल और चीन के ट्रांजैक्शन पर स्थित हैं। भारत के लिए लिपुलेख सामरिक यानी कि स्ट्रेटेजिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और नेपाल में सत्ता परिवर्तन होने के बाद अक्सर ही इस मुद्दे को उछाला जाता है। लेकिन इस बार बालचाल सरकार पर विपक्ष का यह दबाव संबंधों में नई कड़वाहट पैदा कर सकता है। एक तरफ भारत और नेपाल के बीच रोटी बेटी का रिश्ता है। तो वहीं दूसरी तरफ यह सीमा विवाद और अब नेपाल सरकार के साथ वहां की विपक्ष की ओर से भी ऐसे बयान सामने आना दोनों देशों के रिश्तों में असर डाल सकता है।