1942 में ही स्वतंत्रता की झलक बलिया ने अपने बल पर देखी, 80 साल पहले ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ रचा गया था इतिहास

By अभिनय आकाश | Aug 09, 2022

भारत का राष्ट्रीय झंडा देश के हर नागरिक के गौरव और सम्मान का प्रतीक है। जब भी कोई तिरंगे को फहराता है तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती है। भारत इस वर्ष आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। आजादी का 75वां साल है तो जश्न भी उसी सरीखा होना चाहिए, तैयारियां भी कुछ ऐसी ही है। मोदी सरकार से लेकर विपक्ष तक के नेता अपने अपने तरीके से इस जश्न में शामिल हो रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ से भी अपने ट्विटर की डीपी में बदलाव करते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की हाथों में तिरंगा झंडा लिए तस्वीर लगाई है।  आजादी का जो अमृत हमें और आपको चखने को मिला है उसके पीछे कई संघर्ष और कई शहीदों का हाथ है। ये तो हम सभी जानते हैं कि हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। लेकिन क्या आपको पता है कि आजादी के पहले भी एक जिला ऐसा था जो ब्रिटिश हुकूमत से आजाद करा लिए गए थे।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोड़ पर बसा बलिया जिसके गर्म खून और जूनून ने उसे बागी बलिया का तमगा दिया। गंगा और घाघरा के दोआब में बसा बलिया अपने बगावती तेवरों के लिए जाना जाता है। ऋषि-मुनियों से लेकर क्रांतिकारियों तक ने बलिया में अपना नाम हमेशा आगे रखा। अपने विद्रोही तेवरों की वजह से ही बलिया बागी बलिया कहलाया। लोककथाएं बलिया को पौराणिक इतिहास से जोड़ती हैं। महान सांस्कृतिक विरासत को अपने में समेटे ये शहर तमसा के तीर पर बसा है। गंगा और सरयु के दोआब में होने से बलिया हजारों साल पुरानी सभ्यता का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता की क्रांति ने पहली करवट बलिया में ही ली। स्वतंत्रता की सबसे पहली सुबह भी बलिया ने ही देखी। हिन्दुस्तान ब्रिटिश हुकूमत से 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। लेकिन बलिया ने अपने बल पर 1942 में ही स्वतंत्रता की एक सुबह की झलक देखी और पूरे देश का पथ प्रशस्त किया। महात्मा गांधी ने करो या मरो और अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया और बलिया के लोगों ने इस प्रण को पूरा किया और दो हफ्तों के अंदर बलिया को अंग्रेजों से आजाद करा लिया। देश में सबसे पहले बलिया 19 अगस्त 1942 को आजाद हो गया। 9 अगस्त की सुबह ने बलिया वासियों की बेचैनी को आक्रोश में बदल दिया। 

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10 अगस्त के जुलूस ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी

अंग्रेजों ने गांधी-नेहरू कई क्रांतिकारी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसकी जैसी ही खबर बलिया वासियों को मिली। बलिया का बागी खून उबाल मारने लगा। 10 अगस्त को पूरे शहर में हड़ताल का ऐलान हो गया। छात्र स्कूल छोड़ आंदोलन में शामिल होने लगे। व्यापारियों ने भी दुकान बंद करके हड़ताल में हाथ बंटाया। 10 अगस्त के जुलूस ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। कलेक्टर जगदेश्वर निगम ने अंग्रेजी हुकूमत को लिख दिया कि बलिया को आजाद करना ही पड़ेगा, नहीं तो अंजाम कुछ भी हो सकता है। ब्रिटिश हुकूमत को बाहर का रास्ता दिखाने की बलिया ने ठान ली थी। 19 अगस्त 1942 को 25 हजार बागी आजादी के परवाने बनकर मुख्यालय की ओर बढ़ने लगी। लोग जेल में बंद चित्तू पांडेय की रिहाई की मांग करने लगे। तत्कालीन कलेक्टर का नियंत्रण प्रशासन पर नहीं रह गया था और उसे हार मानकर जेल के दरवाजे खोलने पड़े और वह चित्तू पांडेय से यह कहने को मजबूर हुआ कि पंडित जी अब आप ही इस भीड़ को संभालें और शांति व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी लें। इस तरह चित्तू पांडेय ने स्वाधीन बलिया की बागडोर संभाली और तीन दिनों के लिए बलिया स्वतंत्र हो गया। हनुमान गंज इलाके में 24 घंटे के लिए ही सही, लेकिन भारतीय तिरंगा शान से लहराया गया।  लेकिन क्रांति को चाल चलकर प्रशासन ने चरम पर पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया और बाद में फिर बलिया पर अधिकार कर लिया। 

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