Chinese Military अपना अड्डा बनाने आ रही है, भारत हमारी मदद करे, Balochistan Leader Mir Yar ने Jaishankar को सीधे लिखा पत्र

By नीरज कुमार दुबे | Jan 02, 2026

बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। हम आपको बता दें कि बलूच नेता मीर यार बलूच ने गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि चीन निकट भविष्य में बलूचिस्तान में अपनी सेना तैनात कर सकता है। उन्होंने इसे केवल आशंका नहीं बल्कि एक ठोस और उभरता हुआ खतरा बताया है। इसी संदर्भ में उन्होंने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को पत्र लिखकर न केवल स्थिति से अवगत कराया है बल्कि सीधे तौर पर भारत से समर्थन और हस्तक्षेप की अपेक्षा भी जताई है।

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पत्र में उन्होंने यह भी कहा है कि बलूचिस्तान पिछले कई दशकों से उत्पीड़न का शिकार रहा है। उन्होंने कहा है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद बलूच जनता को उसका लाभ नहीं मिला। पाकिस्तान की नीतियों और अब चीन की बढ़ती दखलअंदाजी ने बलूचिस्तान को एक खुले सैन्य क्षेत्र में बदलने का खतरा पैदा कर दिया है। मीर यार बलूच ने भारत को एक जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति बताते हुए अपील की है कि वह इस पूरे घटनाक्रम को केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला मानकर नजरअंदाज न करे।

देखा जाये तो मीर यार बलूच का पत्र साधारण कूटनीतिक संवाद नहीं है। यह दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति में एक धमाके की तरह है। पहली बार किसी प्रमुख बलूच नेता ने खुले तौर पर भारत के विदेश मंत्री से मदद की गुहार लगाई है। यह कदम अपने आप में ऐतिहासिक है और इसके निहितार्थ दूरगामी हैं। यह संकेत देता है कि बलूच आंदोलन अब वैश्विक मंच पर नए साझेदार तलाश रहा है और भारत को वह स्वाभाविक विकल्प मानता है।

चीन और पाकिस्तान की सांठगांठ अब किसी से छिपी नहीं है। सीपीईसी को लंबे समय तक विकास और आर्थिक सहयोग का प्रतीक बताया गया लेकिन वास्तविकता यह है कि यह परियोजना चीन को हिंद महासागर तक सीधी पहुंच देती है। यदि बलूचिस्तान में चीनी सेना की तैनाती होती है तो यह केवल एक प्रांत की समस्या नहीं रहेगी बल्कि भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन जाएगी। इसका अर्थ होगा कि भारत के पश्चिम में एक नया सैन्य दबाव केंद्र उभर रहा है।

मीर यार बलूच द्वारा भारत से सीधे मदद मांगने का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह पाकिस्तान के उस दावे को कमजोर करता है कि बलूच आंदोलन केवल सीमित और आंतरिक विद्रोह है। जब एक आंदोलन अंतरराष्ट्रीय समर्थन की बात करता है तो वह खुद ब खुद वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन जाता है। यदि भारत इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता है तो इससे पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा और चीन की मंशा पर भी सवाल खड़े होंगे। लेकिन यदि भारत चुप रहता है तो चीन बलूचिस्तान में धीरे धीरे अपनी जड़ें जमा सकता है और एक दिन यह उपस्थिति स्थायी सैन्य अड्डे में बदल सकती है। इससे न केवल भारत की पश्चिमी सीमा बल्कि समुद्री सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा।

इसके संभावित परिणाम भी कई स्तरों पर दिखाई देते हैं। पहला परिणाम यह होगा कि बलूचिस्तान में हिंसा और अस्थिरता बढ़ेगी क्योंकि विदेशी सेना की मौजूदगी स्थानीय विरोध को और तीखा करेगी। दूसरा परिणाम यह होगा कि पाकिस्तान चीन पर और अधिक निर्भर हो जाएगा और उसकी संप्रभुता औपचारिक बनकर रह जाएगी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि भारत चीन के दोहरे दबाव के बीच घिर सकता है एक ओर पूर्वी सीमा और दूसरी ओर पश्चिम के नजदीक उभरता नया मोर्चा।

इस पूरे परिदृश्य में भारत के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि वह दर्शक बना रहे या रणनीतिक खिलाड़ी की भूमिका निभाए। मीर यार बलूच का पत्र दरअसल भारत के दरवाजे पर दस्तक है। इसे अनसुना करना भविष्य में भारी पड़ सकता है।

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