बांग्लादेश के बदलते सुरों को गंभीरता से लेना होगा

By ललित गर्ग | Mar 26, 2025

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर कहा कि हमारे रिश्ते बेहद मजबूत हैं। बस कुछ गलतफहमियां हैं, जिन्हें दूर करने की कोशिश की जा रही है। सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली वाली स्थिति में यूनुस किन रिश्तों के मजबूत होने की बात कर रहे हैं, कैसी गलतफहमियां और किनके द्वारा उत्पन्न गलतफहमियों की बात वे कर रहे हैं? यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने भारत से दूरियां बढ़ाने की कोई कसर नहीं छोड़ी, वहां हिन्दुओं एवं हिन्दू मन्दिरों पर कहर बरपाया गया, पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाने की कवायद करते हुए भारत को डराने की कोशिशें हुई, कट्टरपंथी एवं जिहादी ताकतों को सहयोग, समर्थन और संरक्षण दिया गया है, इन सब स्थितियों को उग्र से उग्रतर बनाकर अब यूनुस किन रिश्तों की बात कर रहे हैं, वे क्यों बैंकॉक में आयोजित होने वाले बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करना चाहते हैं? बांग्लादेश का भारत-विरोधी रवैया दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, बल्कि विडम्बनापूर्ण बना है। भारत से पंगा बांग्लादेश को कितना महंगा पड़ रहा है, इसका अनुमान बांग्लादेश की बिगड़ती अर्थ-व्यवस्था, शांति-व्यवस्था एवं अराजकता को देखते हुए सहज ही लगाया जा सकता है। इन ज्वलंत होती स्थितियों का सबसे बड़ा कारण भारत से दुश्मनी ही है। बांग्लादेश में अराजकता, हिंसा एवं जर्जर होते हालात को मोहम्मद यूनुस सरकार नियंत्रित नहीं कर पा रही हैं। मुल्क अभी भी भीड़ की हिंसा की उन घटनाओं से उबर नहीं रहा है, जो पिछले अगस्त में शेख हसीना को सत्ता से हटाने वाले आंदोलन के बाद शुरू हुई थी। यूनुस से क्षेत्र में शांति व सद्भाव की जो उम्मीदें थी, उसमें उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथ को आगे करके निराश ही किया है। उनकी सरकार लगातार विघटनकारी, अड़ियल व बदमिजाजी का रुख अपनाए हुए है। यदि भारतीय प्रधानमंत्री बैंकाक में यूनुस से वार्तालाप करते हैं तो उन्हें उनके इरादों को लेकर सतर्क एवं सावधान रहना चाहिए।

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बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद वहां की अंतरिम सरकार का नेतृत्व कर रहे मोहम्मद यूनुस भले ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हो, लेकिन उनकी सोच एवं कार्य-पद्धति में कट्टरवाद एवं भारत-विरोधी मानसिकता है। भले ही वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से वार्ता करके भारत से दोस्ती का नाटक करें। लेकिन उनके इरादों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और है। चीन के खासे प्रभाव में आकर बांग्लादेश उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। उसने वहां महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्त पोषित किया है और वह बांग्लादेशी सेना के हथियारों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। चीन ने ऐतिहासिक रूप से दक्षिण एशिया में भारतीय प्रभाव का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में इस्तेमाल किया है और वह इस्लामाबाद की मदद से बांग्लादेश में भी अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर नहीं छोड़ रहा है। पाकिस्तान को अतिश्योक्तिपूर्ण ढंग से अपने आतंरिक मामलों में जगह दे देकर बांग्लादेश ने खुद खतरा मौल लिया है। पाकिस्तान भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए बांग्लादेश का उपयोग करता है। वह आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए भी बांग्लादेश का उपयोग करता है। इसी के चलते अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में यूनुस ने कई कट्टरपंथी संगठनों से प्रतिबंध हटाया है और आतंकी गतिविधियों के लिए आरोपित नेताओं को जेल से रिहा भी किया है। भारत को इसकी भी अनदेखी नहीं करना चाहिए कि बांग्लादेश में पाकिस्तान के दखल का मुख्य ध्येय भारत को कमजोर एवं अशांत करना ही है। यूनुस का कार्य व्यवहार चिंतित करने वाला है। वह यथाशीघ्र चुनाव कराने में रुचि दिखाने के बजाय ऐसे एजेंडे अपने हाथ में ले रहे हैं, जिससे लंबे समय तक सत्ता में बना रहा जाए।

अब तो बांग्लादेश की सेना भी यूनुस के रवैये को लेकर सशंकित दिख रही है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के विरुद्ध जिन छात्रों के विद्रोह के चलते यूनुस बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख बने, उन छात्रों ने पिछले दिनों नेशनल सिटिजंस पार्टी नाम से अपना अलग दल गठित कर लिया और यह आरोप भी लगाया कि सेना शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को फिर से सत्ता में लाने की साजिश रच रही है। यह चकित करने वाला घटनाक्रम है। इसलिए और भी, क्योंकि बांग्लादेश की सेना ने इस पार्टी के आरोपों को हास्यास्पद और निराधार करार दिया। भारत को बांग्लादेश के घटनाक्रम पर इसलिए निगाह रखनी होगी, क्योंकि माना जा रहा है कि छात्रों की इस नई पार्टी के गठन के पीछे यूनुस का ही हाथ है। बांग्लादेश में आंतरिक स्थिति जटिल से जटिलतर होती जा रहा है, स्थितियां विकराल हो रही है, आम जनता पर दुःखों, परेशानियों एवं समस्याओं के पहाड़ टूटने लगे हैं। वहां जैसी आंतरिक गुटबाजी, प्रशासनिक शिथिलताएं, अराजकताएं और अव्यवस्थाएं बढ़ रही हैं, उसे देखते हुए सेना प्रमुख जनरल वकार उज-जमां ने सेना की भूमिका बढ़ाने की बात कही है। उनका संकेत साफ है, यदि अंतरिम सरकार हालात को संभाल पाने में नाकाम रहती है, तो सेना मोर्चा संभालने को तैयार है। 

भारत के सहयोग से हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही थी और वह जीडीपी वृद्धि कर रहा था। लेकिन उनके तख्तापलट के बाद से विकास में तेजी से गिरावट आई है और देश मंदी की ओर बढ़ रहा है। विश्व बैंक और आईएमएफ का कहना है कि हसीना के सत्ता से हटने के बाद से बांग्लादेश की विकास-दर आधी हो गई है और उसका कपड़ा उद्योग-जो उसके विकास का आधार था-बेरोजगारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। लेकिन अंतरिम सरकार मौजूदा स्थिति के लिए हसीना सरकार को दोषी ठहराती है, यह बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति है। लेकिन यह तय है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान की बढती नजदीकियां, बांग्लादेश का भारत विरोध और पाकिस्तान प्रेम इस मुल्क पर भारी पड़ रहा है। भले ही 54 सालों में पहली बार बांग्लादेश और पाकिस्तान सीधा कारोबार शुरू हुआ है। देखने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान और भारत के बीच संबंध सामान्य नहीं हैं और व्यापार ठप्प है। ऐसे में इसका असर भारत पर नहीं पाकिस्तान पर जरूर पड़ा है और वहां की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। बांग्लादेश के लिए भारत जो मायने रखता है, उसकी भरपाई पाकिस्तान तो कतई नहीं कर सकता है। जिस बांग्लादेश को पाकिस्तानी क्रूरता से मुक्त कराकर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत ने तमाम कुर्बानियों के बाद जन्म दिया, वही बांग्लादेश क्या सोचकर भारत से दूरियां बढ़ाई? अब अपनी गलती का अहसास करते हुए वह भारत से दोस्ती चाहता है तो भारत को सतर्कता, सावधानी, दूरगामी सोच, कूटनीतिक सोच से कदम उठाने चाहिए।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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