By नीरज कुमार दुबे | Jan 01, 2026
असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ हिमंत बिस्व सरमा सरकार का सख्त और बिना समझौते वाला रुख आज राज्य की राजनीति की धुरी बन चुका है। पिछले पांच वर्षों में एक ओर जहां अवैध घुसपैठ पर निर्णायक कार्रवाई की गयी वहीं दूसरी ओर तेज आर्थिक वृद्धि, मजबूत कानून व्यवस्था और आक्रामक बुनियादी ढांचे के निर्माण ने मुख्यमंत्री को एक परिणाम देने वाले नेता के रूप में स्थापित किया है। इसी दोहरे एजेंडे यानि सुरक्षा और विकास के सहारे भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले बेहद मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। असम की जनता के बीच यह संदेश एकदम स्पष्ट है कि राज्य अब न तो घुसपैठ को बर्दाश्त करेगा और न ही विकास की रफ्तार धीमी पड़ने देगा।
उन्होंने साथ ही दावा किया कि इस नीति से राज्य में कानून व्यवस्था मजबूत हुई है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन में असम देश में पहले स्थान पर है। उन्होंने कहा कि 2021 में जहां 1.33 लाख मामले दर्ज हुए थे वहीं 2025 में यह संख्या घटकर 43748 रह गई है। उन्होंने कहा कि आरोप पत्र दाखिल करने की दर में 81 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और सजा की दर 6 प्रतिशत से बढ़कर 26.38 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
मुख्यमंत्री ने बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर भी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी पर चार नए पुल निर्माणाधीन हैं और फरवरी में गुवाहाटी से उत्तर गुवाहाटी को जोड़ने वाला पुल शुरू होगा। बताया जा रहा है कि इसी माह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काजीरंगा के 32 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर की आधारशिला रखेंगे जिसकी लागत लगभग 6957 करोड़ रुपये है। फरवरी में गेलेफु रेल लाइन परियोजना और गोहपुर से नुमालीगढ़ को जोड़ने वाली सड़क तथा रेल अंडरवाटर टनल परियोजना की भी आधारशिला रखी जाएगी। इसके अलावा एरोसिटी परियोजना और कोपिली जलविद्युत परियोजना को लेकर भी समयसीमा तय कर दी गई है।
आर्थिक मोर्चे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार 2020 से 2025 के बीच असम देश का सबसे तेज गति से बढ़ने वाला राज्य बना है। उन्होंने कहा कि जहां राष्ट्रीय औसत वृद्धि 29 प्रतिशत रही वहीं असम की वृद्धि 45 प्रतिशत दर्ज की गई। उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति आय 1.59 लाख रुपये तक पहुंच गई है और राज्य की राजस्व वृद्धि 53 प्रतिशत रही है।
देखा जाये तो असम की राजनीति में अवैध घुसपैठ का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन हिमंत बिस्व सरमा की सरकार के तेवर इस मुद्दे पर हमेशा से सख्त रहे हैं। विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले के एक सप्ताह के भीतर निष्कासन का ऐलान दरअसल उस असंतोष का जवाब है जो दशकों से असमिया समाज में पलता रहा है। जमीन सिकुड़ने का डर, जनसांख्यिकीय बदलाव और पहचान का संकट इस मुद्दे को गर्माते जा रहे हैं।
देखा जाये तो मुख्यमंत्री का बयान दो संकेत स्पष्ट रूप से देता है। पहला है कि सरकार अब कानूनी प्रक्रिया को अंतिम सत्य मानते हुए उसके बाद किसी तरह की राजनीति या दबाव स्वीकार नहीं करेगी। दूसरा संदेश सीधे बहुसंख्यक मतदाता वर्ग को जाता है कि राज्य सरकार उनकी चिंताओं को हल्के में नहीं ले रही है। देखा जाये तो असम में चुनाव अब केवल सड़क, पुल और अस्पताल तक सीमित नहीं हैं। पहचान और सुरक्षा का सवाल केंद्र में है। घुसपैठ के खिलाफ आक्रामक रुख भाजपा के कोर वोटर को एकजुट करता है और उन मतदाताओं को भी आकर्षित करता है जो लंबे समय से निर्णायक कार्रवाई की मांग कर रहे थे। दूसरी ओर विपक्ष के लिए यह मुद्दा असहज है। यदि वह विरोध करते हैं तो घुसपैठ समर्थक होने का ठप्पा लग सकता है और यदि समर्थन करते हैं तो अपनी पारंपरिक राजनीति से टकराव होगा।
चुनावी गणित में देखें तो मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा का बयान भाजपा के लिए एजेंडा सेट करने वाला है। विकास परियोजनाओं की सूची के साथ जब सुरक्षा और पहचान का मुद्दा जोड़ा जाता है तो संदेश साफ बनता है मजबूत सरकार, मजबूत असम।