ईसाई धर्मांतरण पर भड़क गये Bastar के ग्रामीण, Narayanpur Village में जबरदस्त हंगामा, Christian बने 26 परिवारों का गाँव वालों ने किया बहिष्कार

By नीरज कुमार दुबे | Jun 25, 2026

कांग्रेस के लंबे कार्यकाल और माओवाद के प्रभाव वाले दौर में छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में हिंदुओं को ईसाई बनाने का खेल जमकर चला, लेकिन अब समाज इस मुद्दे पर खुलकर विरोध जताने लगा है। राज्य के नारायणपुर जिले के भरंडा गांव में मंगलवार को यही नाराजगी उस समय स्पष्ट रूप से दिखाई दी जब ग्रामीणों ने 26 ईसाई परिवारों को गांव छोड़ने के लिए कह दिया। ग्रामीणों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि गांव की पारंपरिक आदिवासी रीति रिवाजों, स्थानीय देवी देवताओं और सामाजिक परम्पराओं में किसी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जायेगा तथा किसी भी नये धार्मिक चलन या प्रार्थना सभा की अनुमति गांव के भीतर नहीं दी जायेगी। मामले ने जल्द ही तनावपूर्ण रूप ले लिया, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन को भारी सुरक्षा बल के साथ हस्तक्षेप करना पड़ा।

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अधिकारियों के मुताबिक भरंडा गांव में यह विवाद नया नहीं है। पिछले वर्ष दिसंबर से ही दोनों पक्षों के बीच तनाव बना हुआ था। नौ जून को दोनों समूहों के बीच झड़प होने के बाद हालात और अधिक बिगड़ गए थे। इसके बाद गांव में लगातार बैठकों और चर्चाओं का दौर चलता रहा, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। मंगलवार को गांव में आयोजित एक बैठक के दौरान विवाद अचानक बढ़ गया, जब कुछ ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि ईसाई परिवार गांव के भीतर धार्मिक गतिविधियां और प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहे हैं। इसी के बाद उनसे गांव छोड़ने की मांग की गई।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस और जिला प्रशासन तत्काल सक्रिय हो गया। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुशील नायक ने बताया कि पूरे मामले को शांतिपूर्वक सुलझाने के लिए लगभग 13 से 14 दौर की बातचीत की गई। प्रशासन ने दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया और देर रात समझौते पर सहमति बनी।

समझौते के अनुसार ईसाई परिवार गांव में रह सकेंगे, लेकिन गांव की सीमा के भीतर किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधि नहीं करेंगे। इसमें घरों में प्रार्थना सभा आयोजित करना और अंतिम संस्कार से जुड़ी धार्मिक प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन गतिविधियों के लिए संबंधित परिवारों को गांव से बाहर जाना होगा। साथ ही कुछ ग्रामीणों ने यह भी कहा कि जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया है, उन्हें एक महीने के भीतर अपने मूल धर्म में वापस लौटना चाहिए।

गांव के अन्य निवासियों का कहना है कि आदिवासी परंपराओं, स्थानीय देवी देवताओं और सामाजिक रीति रिवाजों के विरुद्ध मानी जाने वाली किसी भी गतिविधि को गांव के भीतर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनका तर्क है कि पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना आवश्यक है और बाहरी धार्मिक प्रभावों से गांव की सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो रही है। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया कि पूरे घटनाक्रम के दौरान किसी प्रकार की हिंसा की सूचना नहीं मिली। इसके बावजूद स्थिति इतनी संवेदनशील थी कि पूरे दिन अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी। पुलिस लगातार गांव और आसपास के इलाकों में नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।

बुधवार को पुलिस ने बताया कि भरंडा गांव में स्थिति फिलहाल शांतिपूर्ण है, लेकिन एहतियात के तौर पर सुरक्षा बलों की तैनाती जारी रहेगी। प्रशासन ने दोनों पक्षों से आपसी सौहार्द बनाए रखने और बातचीत के माध्यम से मतभेद सुलझाने की अपील की है।

हम आपको बता दें कि बस्तर के दूरदराज इलाकों में धार्मिक मतांतरण को लेकर इस प्रकार के विवाद समय समय पर सामने आते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में आदिवासी समुदायों और ईसाई धर्म अपनाने वाले परिवारों के बीच कई स्थानों पर इसी तरह के मतभेद उभर चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और पारंपरिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे मामलों में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती शांति बनाए रखने के साथ-साथ सभी समुदायों के अधिकारों और संवेदनशीलताओं के बीच संतुलन स्थापित करना होती है।

बहरहाल, भरंडा गांव की घटना ने एक बार फिर बस्तर क्षेत्र में धार्मिक मतांतरण और सामाजिक समरसता से जुड़े मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। फिलहाल प्रशासन की कोशिश है कि दोनों पक्ष शांतिपूर्वक सहअस्तित्व बनाए रखें और किसी भी प्रकार का तनाव दोबारा हिंसक रूप न ले।

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