Maha Khubh 2025: महामंडलेश्वर बनने के लिए होनी चाहिए ये योग्यताएं, सम्मानजनक और सबसे बड़ी होती है ये उपाधि

By अनन्या मिश्रा | Feb 07, 2025

महामंडलेश्वर एक ऐसी उपाधि है, जो भारतीय संत परंपरा में विशेष रूप से अखाड़ों के प्रमुख साधुओं को दी जाती है। महामंडलेश्वर शब्द का अर्थ 'मंडल का सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता' से होता है। हिंदू धर्म के अखाड़ों में यह पद सबसे ऊंचा होता है। हिंदू धर्म में वैष्णव, शैव और उदासी संप्रदायों के साधुओं को दी जाती है। महामंडलेश्वर की उपाधि सम्मानजनक होती है। यह उपाधि विशेष रूप से अखाड़ों के प्रमुख साधुओं को दी जाती है।

शिव पुराण, स्कंद पुराण और वायु पुराण जैसे ग्रंथों में संतों और साधुओं की परंपराओं का विस्तार से विवरण मिलता है। इन धार्मिक ग्रंथों में संत समाज की भूमिका, संगठन और उनके कर्तव्यों का भी जिक्र मिलता है। इन पुराणों में महामंडलेश्वर जैसे पद का उल्लेख भी मिलता है। मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में भी संन्यासियों के अधिकाओं और भूमिका का उल्लेख दिया गया है। इन धार्मिक ग्रंथों में संतों के जीवन में तपस्या, संयम और समाज के कल्याण के महत्व को भी अच्छे तरीके से वर्णित किया गया है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको महामंडलेश्वर पद के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

जब किसी अखाड़े से कोई जातक संन्यास या महामंडलेश्वर की उपाधि के लिए संपर्क करता है। तो उसको अपना नाम, एड्रेस, क्वालिफिकेशन, सगे-संबंधियों का ब्योरा और नौकरी-व्यवसाय की जानकारी देना अनिवार्य होता है।

इसके बाद अखाड़े के थानापति के माध्यम से डॉक्यूमेंट्स की अच्छे से जांच की जाती है और थानापति से रिपोर्ट मिलने के बाद अखाड़े के सचिव और पंच अलग-अलग तरीके से जांच करते हैं।

वहीं कुछ लोग संबंधित व्यक्ति के घर जाकर उनके परिवारजनों या फिर रिश्तेदारों आदि से संपर्क कर सच्चाई का पता लगाते हैं।

संतों की टीम स्कूल-कालेज में जाकर भी उस व्यक्ति के बारे में पूछताछ करती है।

पुलिस वेरिफिकेशन के बाद सभी रिपोर्ट अखाड़े के सभापति को दी जाती है और फिर वह अपने स्तर से जांच कराते हैं।

सभी जांचें पूरी होने के बाद अखाड़े के पंच उस व्यक्ति के ज्ञान की परीक्षा लेते हैं। इन सबमें खरा उतरने के बाद ही उस व्यक्ति को महामंडलेश्वर की उपाधि दिए जाने का निर्णय लिया जाता है।

योग्यता

बता दें कि महामंडलेश्वर का पद काफी जिम्मेदारियों से भरा होता है। इसके लिए आचार्य या शास्त्रों होना जरूरी है। ऐसा व्यक्ति जिसने वेदांग की शिक्षा हासिल कर रखी हो। अगर ऐसी कोई डिग्री न हो तो उस व्यक्ति का कथावाचक होना जरूरी है। लेकिन इसके लिए वहां मठ का भी होना अनिवार्य है। फिर साधु-संतों की तरफ से मठ की जांच की जाती है। जिसमें यह देखा जाता है कि मठ के द्वारा वहां पर सनातन धर्मावलंबियों के लिए मंदिर, गोशाला और विद्यालय आदि का संचालन हो रहा है या नहीं। अगर जांच के बाद अपेक्षा अनुरूप काम होता है, तो उस व्यक्ति को महामंडलेश्वर की पदवी मिल जाती है।

इसके अलावा समाज से मोहभंग होने पर कई बार पुलिस-प्रशासन के अधिकारी, इंजीनियर, अधिवक्ता, डाक्टर, वैज्ञानिक और राजनेता भी संन्यास ले लेते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को भी किसी अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया जा सकता है। इनके लिए संन्यास में उम्र की छूट भी रहती है। फिर इनके जरिए धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाया जाता है।

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