समान नागरिक संहिता की शुरुआत देवभूमि उत्तराखण्ड से होना सुखद संकेत

By ललित गर्ग | Mar 29, 2022

समान नागरिक आचार संहिता का मुद्दा आज एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल यह मुद्दा आज का नहीं है, यह अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित में चिन्तन, निर्णय एवं क्रियान्वयन की अपेक्षा है। भले ही भाजपा के लिये यह चुनावी मुद्दा रहा हो, लेकिन इसको लागू करने की अपेक्षा सभी जाति, धर्म, वर्ग, भाषा के लोगों के हित में है। हां, इसे लागू करने का साहस एवं दूरदर्शिता भाजपा और उसके नेता प्रदर्शित कर रहे हैं, यह स्वागतयोग्य है। इसे मजहब या साम्प्रदायिकता की राजनीति से ऊपर उठ कर पूरे देश की सामाजिक समरसता के नजरिये से देखा जाना चाहिए। संवैधानिक दृष्टि से भी यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है क्योंकि भारत का संविधान धर्म या जाति-बिरादरी अथवा स्त्री-पुरुष या क्षेत्रीय पहचान की परवाह किये बिना प्रत्येक नागरिक को एक समान अधिकार देता है। उत्तराखंड के पुनः मुख्यमन्त्री बने पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह राज्य में एक समान नागरिक आचार संहिता को लागू करने के अपनी पार्टी भाजपा के चुनावी फैसले को लागू करने का इरादा जाहिर किया है उसका देश के सभी राज्यों में बिना आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के स्वागत किया जाना चाहिए।

कांग्रेस सरकारों ने हिन्दू एवं अन्य धर्मों को कमजोर करने एवं मुस्लिमों को संख्याबहुल बनाने के लिये अपने हित को सर्वोपरि माना। अपनी इन्हीं गलत नीतियों एवं संकीर्ण राजनीति के कारण कांग्रेस लगातार कमजोर होते होते अब एकदम रसातल में जा चुकी है। आजादी के बाद जिस तरह मुस्लिम सम्प्रदाय के लोगों को उनकी मजहब की पहचान के आधार पर उनके धार्मिक कानूनों को मान्यता देने का प्रावधान किया गया वह देश की आन्तरिक एकता व समरसता में व्यवधान पैदा करने वाला था। सभी मत-मजहब वालों के लिए तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार, विवाह की आयु, बच्चों को गोद लेने और विरासत संबंधी नियम एक समान बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि इन सभी मामलों में एक जैसे नियम बन जाते हैं तो समान नागरिक संहिता का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। इसकी शुभ शुरुआत देवभूमि से हो रही है, यह सुखद संकेत है।

तथ्य यह भी है कि गोवा में समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है और वहां सभी समुदायों के लोग रहते हैं। आखिर जो व्यवस्था गोवा में बिना किसी बाधा के लागू है, वह शेष देश में क्यों नहीं लागू हो सकती? प्रश्न यह भी है कि जब अन्य कई लोकतांत्रिक देशों में तुर्की, सूडान, इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश, इजिप्ट और पाकिस्तान में समान नागरिक संहिता लागू है तो भारत में उसका विरोध क्यों होता है? देश के अनेक मुस्लिम संगठनों ने आजादी के आन्दोलन में सहयोग एवं सहभागिता ही नहीं की, बल्कि भारत के बंटवारे का विरोध भी किया था। लेकिन आजाद भारत में इन संगठनों ने भी कभी मुसलमानों को भारत की राष्ट्रीय धारा में मिलने की प्रेरणा नहीं दी और उनकी मजहबी पहचान को खास रुतबा दिये जाने की ही कोशिशें करते हुए सर्वाधिक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी को इसके उपाय सुझाये। सबसे दुखद यह है कि 1947 में मजहब के आधार पर ही मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र पाकिस्तान बनाये जाने के बावजूद हमने अपनी राष्ट्रीय नीति में परिवर्तन नहीं किया और इसके उलट उन्हीं प्रवृत्तियों व मानसिकता को मुल्ला-मौलवियों व मुस्लिम उलेमाओं की मार्फत संरक्षण दिया गया जिन्होंने भारत के बंटवारे तक में अहम भूमिका निभाई थी। जिसकी वजह से भारत में मुसलमानों की राजनैतिक पहचान एक ‘वोट बैंक’ के रूप में बनती चली गई और ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का अघोषित एजेंडा चल पड़ा।

देश में मुसलमान लगातार बहुसंख्य बनने की ओर अग्रसर होता रहा और बहुसंख्य हिन्दू लगातार अल्पसंख्य होने की कगार पर अग्रसर होता रहा। सोचने वाली बात तो यह है कि कांग्रेस ने भी मुसलमानों को वोट बैंक से अधिक नहीं समझा और अपने स्वार्थ के लिये उनका इस्तेमाल किया। इससे इस समुदाय के लोगों का आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परिवेश हमेशा पिछड़ा ही रहा। अब मोदी सरकार न केवल इस वर्ग के लोगों का जीवनस्तर ऊपर उठाने की कोशिश कर रही है, बल्कि उन्हें उन्नत जीवनशैली भी दे रही है।

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इंडियन पैनल कोड 1860 की धारा 494 के अनुसार कोई भी स्त्री या पुरुष एक विवाह के रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकता। दूसरी ओर मुस्लिम पुरुष 4 शादियां कर सकता है। सीआरपीसी 1973 की धारा 125 के अनुसार तलाकशुदा पत्नी पति से आजन्म गुजारा भत्ता लेने की हकदार है। मुस्लिम महिलाओं के लिए ऐसा नहीं है। शाहबानो केस इसका उदाहरण है। इसी तरह बाल विवाह निषेध अधिनियम 1929 के अनुसार बाल विवाह अपराध है, परन्तु मुस्लिम समाज के लिए यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। ईसाई विवाह अधिनियम 1872, ईसाई तलाक अधिनियम 1869 भी पुराने हैं व हिन्दू विवाह अधिनियम से अलग हैं। ये विषमताएं देश की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्नचिन्ह हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत का समान आचार संहिता पर बहुत ही तर्कसंगत दृष्टिकोण है। इस मुद्दे को लेकर संघ और भाजपा पर अत्यंत संकीर्ण, सांप्रदायिक और समाज-विरोधी दृष्टिकोण का आरोप लगता रहा है। जबकि मोहन भागवत का दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट है कि जो भारत में पैदा हुआ और जो भी भारत का नागरिक है, वह हिंदू है। हिंदू होने और भारतीय होने में कोई फर्क नहीं है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर भी मोहन भागवत की राय है कि सर्वसम्मति के बिना इसे लागू करना उचित नहीं होगा।

उत्तराखंड पूरे देश में ‘देवभूमि’ के नाम से जाना जाता है, यह अध्यात्म की अलौकिक भूमि है, जहां सद्भावना एवं सौहार्द इंसानों में ही नहीं, जीव-जंतुओं एवं पशु-पक्षियों तक में व्याप्त है। संकीर्णता से ऊपर उठ कर जो किसी भी व्यक्ति में ईश्वर की सर्व व्यापी निरंकार सत्ता का बोध कराती है। ईश्वर की पृथ्वी पर इस निकटता को केवल सनातन या हिन्दू दर्शन अथवा इस धरती से उपजे अन्य धर्म दर्शन ही बताते हैं। अतः बहुत आवश्यक है कि इस देवभूमि में सभी नागरिकों का आचरण एक समान ही हो और सभी के लिए सामाजिक नियम एक समान हों। वैसे गौर से देखा जाये तो 2000 में उत्तराखंड बनने से पहले और बाद में भी इसकी पर्वतीय जनसंख्या में खासा परिवर्तन आया है और पहाड़ों पर मुस्लिम जनसंख्या में खासा इजाफा हुआ है। उत्तराखंड में मदरसों की संख्या तक में अभिवृद्धि हो रही है। जब धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा तो देश सही मायने में धर्मनिरपेक्ष बनेगा। विभिन्न समुदायों के बीच एकता की भावना पैदा होगी। एक ही विषय पर कम कानून होने से न्यायतंत्र को भी फैसले देने में आसानी होगी। कई मुस्लिम देशों जैसे टर्की व ट्यूनिशिया आदि ने भी शरीयत से हटकर नागरिक कानून बनाये हैं। मुस्लिम समाज को मुख्य धारा में आने व अपने सामाजिक उत्थान के लिए सरकार पर समान नागरिक आचार संहिता लागू करने के लिए दबाव बनाना चाहिए। राजनीतिक दलों एवं विभिन्न राज्य सरकारों को भी मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक ना मानते हुए तुष्टीकरण की नीतियों से ऊपर उठ कर सामाजिक समरसता व हर वर्ग के उत्थान के लिए काम करना चाहिए।

-ललित गर्ग

(लेखक, पत्रकार एवं समाजसेवी)

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