By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 29, 2026
भगत सिंह को देशभर में उस क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है, जिसे महज 23 वर्ष की उम्र में फांसी दे दी गई थी। हालांकि, उनके जीवन का एक कम चर्चित अध्याय उन्हें लखनऊ से जोड़ता है। यह संबंध ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’, उससे जुड़े क्रांतिकारियों और उन पर लिखे भगत सिंह के लेखों के माध्यम से सामने आता है, जिनमें उन्होंने इन क्रांतिकारियों व उनके संघर्ष के घटनाक्रम को दर्ज किया था।
इस लूट का उद्देश्य अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना था। इस घटना में शामिल चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर लगभग सभी क्रांतिकारी बाद में गिरफ्तार कर लिए गए थे। उस समय भगत सिंह कानपुर में रह रहे थे और हिंदुस्तान रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ चुके थे।
काकोरी एक्शन के बाद क्रांतिकारियों पर हुई कार्रवाई उनके राजनीतिक विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। उस समय भगत सिंह की उम्र 18 वर्ष भी नहीं थी। मई 1927 में भगत सिंह ने ‘विद्रोही’ उपनाम से पंजाबी में ‘काकोरी के वीरों से परिचय’ शीर्षक से एक लेख लिखा था।
यह लेख चमन लाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘भगत सिंह के पूर्ण दस्तावेज’ में शामिल है। क्रांतिकारियों के खिलाफ चली न्यायिक कार्यवाही के बारे में भगत सिंह के अपने विवरण से उनके प्रति उनके सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का पता चलता है। उन्होंने फैसला सुनाए जाने के दिन को याद करते हुए लिखा था कि क्रांतिकारी यह गीत गाते हुए अदालत पहुंचे थे, ‘‘सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।’’ उन्होंने लिखा कि क्रांतिकारियों ने अपनी सजा सुनी और इस दौरान हंसते रहे।
हालांकि, वह क्षण भावुक करने वाला था जब वे लोग, जिन्होंने एक-एक पल साथ गुजारा था, वे एक-दूसरे से अलग किए जाने वाले थे। भगत सिंह ने लिखा था कि आम लोग क्रांतिकारियों के बीच के गहरे प्रेम को समझ नहीं सकते। उन्होंने लिखा, ‘‘जिन्होंने अपना सिर कुर्बान करके प्रेम की गली में कदम रखा है, उनकी महानता को हम जैसे अभागे लोग कैसे समझ सकते हैं?’’ भगत सिंह ने कहा था कि क्रांतिकारियों के बीच आपसी स्नेह इतना गहरा था कि ‘‘हम उसे सपने में भी नहीं जान सकते।’’ इसके बाद उन्होंने क्रांतिकारियों को सुनाई गई सजाओं का उल्लेख किया।
तीन को मृत्युदंड, एक को आजीवन निर्वासन, एक को 14 वर्ष के कारावास और चार को 10-10 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी। बाकी क्रांतिकारियों को पांच से 10 वर्ष तक के सश्रम कारावास की सजा दी गई थी। भगत सिंह ने याद किया कि न्यायाधीश ने क्रांतिकारियों से कहा था कि वे ‘‘सच्चे सेवक और आत्मबलिदानी लोग’’ हैं, लेकिन उन्होंने गलत रास्ता चुना है।
इस पर भगत सिंह ने लिखा था, ‘‘केवल गरीब भारत में ही सच्चे देशभक्तों का ऐसा हश्र हो सकता है।’’ बिछड़ने के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए भगत सिंह ने लिखा था कि युवा क्रांतिकारी अपने वरिष्ठ साथियों के सामने झुककर उनका आशीर्वाद लेते और आहें भरते हुए एक-दूसरे से गले मिलते थे। उन्होंने विशेष रूप से राम प्रसाद बिस्मिल की विदाई को याद करते हुए लिखा था, ‘‘दार-ओ-दीवार पे हसरत से नजर करते हैं, खुश रहो अहले वतन, हम तो सफर करते हैं।’’ भगत सिंह ने काकोरी के क्रांतिकारियों के बलिदान और जेल के बाहर मौजूद लोगों की उदासीनता पर टिप्पणी करते हुए अपना लेख समाप्त किया। उन्होंने लिखा, ‘‘हम एक बार आह भरते हैं और समझते हैं कि हमारा कर्तव्य पूरा हो गया।
हमारे भीतर आग नहीं लगती, हम पीड़ा से नहीं तड़पते; हम इतने मुर्दा हो गए हैं।’’ भगत सिंह ने लोगों से उन क्रांतिकारियों की पीड़ा को समझने का आह्वान किया, जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था। यह लेख ‘विद्रोही’ नाम से प्रकाशित हुआ था। पुस्तक में दिए संपादकीय नोट के अनुसार, लेख के प्रकाशन के कुछ समय बाद ही भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया था।
इसी दौरान हथकड़ी लगे भगत सिंह के चारपाई पर बैठे होने की प्रसिद्ध तस्वीर खींची गई थी। चमन लाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज’ का हवाला देते हुए शर्मा ने कहा कि काकोरी मामले में कार्रवाई के समय भगत सिंह पहले से ही क्रांतिकारी संगठन से जुड़े हुए थे। वहीं, सुधीर विद्यार्थी द्वारा संपादित एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक ‘भगत सिंह : क्रांति का साक्ष्य’ का हवाला देते हुए बाजपेयी ने कहा कि काकोरी प्रकरण से भगत सिंह का जुड़ाव केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने इस घटना पर लेखन और दस्तावेजीकरण भी किया।
बाजपेयी ने कहा, ‘‘इसलिए लखनऊ से उनका जुड़ाव केवल भौगोलिक नहीं था। लखनऊ के निकट काकोरी भगत सिंह के लिए ऐसा घटनाक्रम बना, जिसे उन्होंने देखा, समझा और उस पर लिखा, जबकि इसी दौरान उनके राजनीतिक विचार भी आकार ले रहे थे।’’ शर्मा और बाजपेयी द्वारा तैयार भगत सिंह पर आधारित दास्तान का पहला मंचन 19 दिसंबर को लखनऊ में होगा। यह तारीख राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और रोशन सिंह के शहादत दिवस के रूप में भी जानी जाती है।
तीनों को 19 दिसंबर, 1927 को फांसी दी गई थी। शर्मा और बाजपेयी इससे पहले अपनी दास्तानों के जरिए भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और उससे जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों की कहानियां व्यापक दर्शकों तक पहुंचा चुके हैं। उनकी प्रस्तुतियों में महात्मा गांधी, वाजिद अली शाह, बेगम हजरत महल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बिरसा मुंडा, चंद्रशेखर आजाद, जवाहरलाल नेहरू और कैफी आजमी जैसे व्यक्तित्व शामिल रहे हैं।
दोनों कलाकार काकोरी ट्रेन एक्शन पर भी दास्तान पेश कर चुके हैं। भगत सिंह पर उनकी दास्तान इसी क्रम की नवीनतम प्रस्तुति है। इसमें लखनऊ से भगत सिंह के उस संबंध को केंद्र में रखा गया है, जो काकोरी प्रकरण के माध्यम से सामने आता है।
यह उस युवा क्रांतिकारी की कहानी है, जिसने काकोरी मामले में शामिल क्रांतिकारियों के संघर्ष और उनके साथ हुए घटनाक्रम को पढ़ा, समझा और अपने लेखन में दर्ज किया। काकोरी के क्रांतिकारियों का संघर्ष और उनका बलिदान भगत सिंह की राजनीतिक यात्रा के विकास के महत्वपूर्ण संदर्भों में से एक रहा।