राजस्थान के ऐतिहासिक शहर भीलवाड़ा में देखने और जानने के लिए है बहुत कुछ

By प्रीटी | Mar 21, 2020

राजस्थान का ऐतिहासिक गाथाओं से भरा प्रसिद्ध नगर है भीलवाड़ा। यह मेवाड़ क्षेत्र का एक प्रमुख नग है जोकि राजस्थान के सबसे बड़े जिलों में से एक है। भीलवाड़ा शहर सिर्फ देश के ही नहीं विदेशों के पर्यटकों के बीच भी काफी प्रसिद्ध है। 1948 में राजस्थान का हिस्सा बनने से पहले भीलवाड़ा भूतपूर्व उदयपुर रियासत का हिस्सा था। भीलवाड़ा का नामकरण भील राजा भलराज के नाम पर पड़ा जोकि एक बहादुर और शक्तिशाली योद्धा थे। यहाँ के पर्यटन स्थलों की बात करें तो उनमें शुमार हैं-

भीलवाड़ा शहर से 15 किलोमीटर दूर बनास नदी के किनारे बहुत पुराना और विशाल बढ़ा देवी का मंदिर है यह बहुत विख्यात है यहां पर बारिश के मौसम में बड़ी संख्या में लोग घूमने के लिए आते हैं यहां पर नवरात्रि में रामायण मेले में बड़े-बड़े कलाकारों का तांता लगा रहता है। इसके अलावा यहां अष्टमी के दिन बड़े मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें राष्ट्रीय स्तर के कलाकार आते हैं। अष्टमी के दिन देवली मैं भव्य जुलूस निकलता है जो बाद में माता जी के यहां पर आते हैं।

भीलवाड़ा से 15 किलोमीटर कोटा रोड़ की तरफ चावंडिया तालाब स्थित है जहां तालाब के मध्य माता चामुंडा का मंदिर स्थित है। यहां हर वर्ष अक्टूबर से मार्च के मध्य विदेशी प्रवासी पक्षी आते हैं और इसी कारण इसे पक्षी ग्राम के नाम से जाना जाता है। यह पर्यटकों और पक्षी प्रेमियों के लिए बहुत ही सुन्दर जगह है। यहां हर वर्ष ज़िला प्रशासन और कुछ संस्थाओं के द्वारा हर वर्ष पक्षी महोत्सव का आयोजन किया जाता है जहां देश-विदेश से पक्षी विशेषज्ञ अवलोकन के लिए आते हैं।

दरगाह हजरत गुल अली बाबा

शहर के सांगानेरी गेट पर स्थित यह दरगाह आस्ताना हज़रत गुल अली बाबा रहमतुल्लाह अलेही के नाम से मशहूर है यहाँ सभी धर्मों में आस्था रखने वाले लोग आते हैं। दरगाह पर प्रति वर्ष 1 से 3 नवम्बर तक उर्स का आयोजन होता है जो बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। दरगाह के पास ही एक विशाल मस्जिद भी स्थित है जो रज़ा मस्जिद के नाम से जानी जाती है। इस मस्जिद में पांच हजार लोग एकसाथ नमाज अदा कर सकते हैं। दरगाह के सामने ही सुव्यवस्थित ढंग से एक नगरी बसी हुई है जिसे गुल अली नगरी के नाम से जाना जाता है।

गाँधी सागर तालाब

यह तालाब शहर के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित है। किसी ज़माने में यह लोगों के लिए प्रमुख पेयजल स्रोत हुआ करता था। इस तालाब के मध्य में एक विशाल टापू स्थित है। यह तालाब लोगों के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। इसके उत्तरी छोर पर हजरत मंसूर अली रहमतुल्लाह अलेह व हजरत जलाल शाह रहमतुल्लाह अलेह की दरगाह स्थित है। इन दरगाहों के एक तरफ तेजाजी का मंदिर और दूसरी तरफ बालाजी का मंदिर स्थित है। इस पर्यटन स्थल को विकसित करने के लिए इसके दक्षिणी किनारे पर एक मनोरम पार्क का निर्माण कराया गया है जिसका नाम वीर तेजा जी पार्क रखा गया है। बरसात के मौसम में इस तालाब से गिरते पानी का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है।

हरणी महोदव

भीलवाड़ा से 6 किलोमीटर दूर मंगरोप रोड़ पर शिवालय है। जोकि हरणी महोदव के नाम से प्रसिद्ध है। जहां पर प्रत्‍येक शिवरात्रि पर 3 दिवसीय भव्‍य मेले का आयोजन होता है। मेले का आयोजन जिला प्रशासन द्वारा नगर परिषद के सहयोग से किया जाता है जिसमें 3 दिन तक प्रत्‍येक रात्रि में अलग-अलग कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। यह मन्दिर पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है।

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जटाऊँ शिव मंदिर

11वीं शताब्दी के मध्य में स्थापित जटाऊँ का मंदिर एक शिव मंदिर है। इस मंदिर को भील राजा ने बनाया था, जो यहाँ सबसे पहले इस क्षेत्र में बसे थे। भील जहां भी बसे अक्सर देखने में आया है कि वहां शिव मंदिर और कालिका माता मंदिर जरूर बनाये गये हैं।

बदनोर

भीलवाड़ा शहर से 72 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे का इतिहास में एक अलग ही महत्व है। जब मेड़ता के राजा जयमल ने राणा उदेसिंह से सहायता के लिए कहा तो राणा ने जयमल को बदनोर जागीर के रूप में दिया। बदनोर में कई देखने योग्य स्थल हैं। उनमें से निम्न हैं- छाचल देव। अक्षय सागर। जयमल सागर। बैराट मंदिर। धम धम शाह बाबा की दरगाह। आंजन धाम। केशर बाग़। जल महल आदि।

कोटडी

भीलवाड़ा शहर से 23 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे का नाम आते ही सबसे पहले विख्यात श्री चारभुजा जी का मंदिर स्मृति में आता है। भीलवाड़ा-जहाजपुर रोड पर स्थित यह नगर भगवान के मंदिर के कारण काफी प्रसिद्ध है। सगतपुरा का देवनारायण मंदिर, पारोली में चंवलेश्वर मंदिर, मीराबाई का आश्रम व ढोला का सगस जी (भूत), कोठाज का श्री चारभुजा जी का मंदिर देखने योग्य हैं। आसोप के चारभुजा नाथ का मंदिर भी दर्शनीय है। देवनारायण जी का मन्दिर बागडा़ में बना हुआ है जहाँ पर मूर्तियाँ अपने आप जमीन से बाहर निकलीं।

जहाजपुर

यह भीलवाड़ा का प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जिसका इतिहास बड़ा रंगबिरंगा रहा है। कर्नल जेम्स टॉड 1820 में उदयपुर जाते समय यहाँ आये थे। यहाँ का बड़ा देवरा (पुराने मंदिरों का समूह), पुराना किला और गैबीपीर के नाम से प्रसिद्ध मस्जिद दर्शनीय हैं। यहा पर जैन धर्म का मंदिर भी है जो स्वस्तिधाम के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में श्री मुनि सुवर्तनाथ की प्राकट्य प्रतिमा है जो बहुत अद्भुत है। यह प्रतिमा चमत्कारी है। जहाजपुर से 12 किलोमीटर दूर श्री घटारानी माता जी का मंदिर है जो अतिसुन्दर व दर्शनीय है तथा इस मंदिर से 2 किलोमीटर दूर पंचानपुर चारभुजा का प्राकट्य स्थान मंदिर है। जहाजपुर क्षेत्र में एक नागदी बांध है जो आकर्षक है। यहाँ एक नदी भी हे जिसे नागदी नदी के नाम से जाना जाता है। इसे जहाजपुर की गंगा भी कहते हैं। जहाजपुर में देखने के लिए अनेकों मंदिर व धर्मस्थल हैं।

-प्रीटी

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