Video | पलकें झपकाते हुए दुनिया से विदा... Harish Rana के परिवार का भावुक वीडियो वायरल, 13 साल के दर्द से मिलेगी मुक्ति

By रेनू तिवारी | Mar 16, 2026

सोशल मीडिया पर एक हृदयविदारक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा का परिवार उन्हें अंतिम विदाई दे रहा है। यह विदाई साधारण नहीं है; यह एक ऐसी विदाई है जो 13 साल के लंबे इंतजार, कोमा की यंत्रणा और कानूनी लड़ाई के बाद मिली है। हरीश को अब दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के पैलिएटिव केयर यूनिट में स्थानांतरित कर दिया गया है, जहाँ वे आने वाले हफ्तों में 'चिकित्सकीय निगरानी' के तहत अंतिम सांस लेंगे।

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वीडियो में एक ब्रह्मा कुमारी बहन को उदास मुस्कान के साथ उनके माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए भी दिखाया गया है, जबकि उनकी मज़बूत माँ पीछे से चुपचाप देख रही हैं। वीडियो में ब्रह्मा कुमारी लवली कहती हैं, "सबको माफ़ करते हुए, सबसे माफ़ी माँगते हुए, तुम जाओ।"

कुमारी लवली का जुड़ाव 'प्रभु मिलन भवन' से है, जो गाज़ियाबाद में ब्रह्मा कुमारी का एक केंद्र है। राणा परिवार लंबे समय से ब्रह्मा कुमारी आंदोलन से जुड़ा रहा है। यह महिलाओं द्वारा चलाया जाने वाला एक आध्यात्मिक संगठन है, जिसकी स्थापना 1937 में हुई थी और इसका मुख्यालय माउंट आबू में है।

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यह पल सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरीश राणा को गरिमा के साथ मरने की अनुमति दिए जाने के कुछ दिनों बाद आया है। यह भारत में 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा-मृत्यु) का पहला ऐतिहासिक मामला है, जिसमें कोर्ट ने आदेश दिया है। कोर्ट ने डॉक्टरों की इस राय को माना कि राणा कभी ठीक नहीं हो पाएँगे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी माना कि जिन नली (ट्यूब) के ज़रिए उन्हें खाना दिया जा रहा है और उन्हें ज़िंदा रखा जा रहा है, वे सिर्फ़ उनके दर्द को बढ़ा रही हैं। यह ऐसा दर्द है जिसे 32 साल के हरीश किसी को बता भी नहीं पा रहे हैं।

11 मार्च को कोर्ट के आदेश के बाद, हरीश राणा को दिल्ली के AIIMS की पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ़्ट कर दिया गया। वहाँ एक मेडिकल बोर्ड उनके जीवन के अंतिम समय की देखभाल (end-of-life care) की योजना बनाएगा।

हालाँकि डॉक्टरों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि उनकी हालत ठीक नहीं हो सकती, फिर भी सुप्रीम कोर्ट को यह साफ़ करना पड़ा कि वेंटिलेटर के अलावा, खाने और मेडिकल ट्यूब को हटाना कानूनी तौर पर 'पैसिव यूथेनेशिया' माना जा सकता है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने यह ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। इस फ़ैसले से परिवार को अस्पताल में ही जीवन-रक्षक उपकरणों (life support) को हटाने की अनुमति मिल गई, जिससे हरीश राणा गरिमा के साथ अपनी जान दे पाएँगे। इस मामले ने भारत में जीवन के अंतिम समय के अधिकारों (end-of-life rights) को लेकर डॉक्टरों और वकीलों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। पंजाब यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग के छात्र राणा को 2013 में अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद सिर में चोटें आई थीं, और तब से वह कोमा में हैं।

फैसले के तुरंत बाद, राणा के पिता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके बेटे से कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति देने से परिवार को कोई निजी लाभ नहीं होगा। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला ऐसी ही स्थितियों का सामना कर रहे अन्य लोगों की मदद कर सकता है।

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