बड़े बदलाव की तैयारी! सार्वजनिक बैंक बोले- 'विकसित भारत' को चाहिए 2 ग्लोबल बैंक

By Ankit Jaiswal | Oct 31, 2025

बीएस बीएफएसआई समिट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के शीर्ष अधिकारियों ने यह राय दी कि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए कम से कम दो बैंक ऐसे होने चाहिए जो दुनिया के शीर्ष 20 बैंकों में शामिल हों। उनका मानना है कि “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए देश को बड़े आकार के बैंकों की आवश्यकता है।

इसी कड़ी में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के एमडी और सीईओ अशील पांडे ने कहा कि अब बैंक पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़े प्रोजेक्ट्स को फंड कर रहे हैं. पहले जहां 800 से 1500 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स होते थे, वहीं अब 8,000 से 15,000 करोड़ रुपये तक के प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डॉलरीकरण में कमी और देश की बढ़ती वित्तीय जरूरतें भी बड़े बैंकों की मांग बढ़ा रही हैं।

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कई बार विलय की प्रक्रिया हुई है। पहले एसबीआई ने अपने सहयोगी बैंकों को मिलाया, फिर 2019 में बैंक ऑफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक का विलय हुआ। इसके बाद 2020 में बड़े पैमाने पर एक और एकीकरण हुआ था।

जानकारों का कहना है कि जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है. जो अब 3 ट्रिलियन डॉलर के पार है  वैसे ही वित्तीय संस्थानों को भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना आवश्यक है। बड़े बैंक न केवल बड़े प्रोजेक्ट्स को संभाल सकते हैं, बल्कि तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मानव संसाधन के बेहतर प्रबंधन में भी अधिक सक्षम होते हैं।

बता दें कि पैनल में शामिल बैंकरों ने यह भी कहा कि किसी भी विलय के दौरान पारदर्शिता, सांस्कृतिक तालमेल और एचआर नीतियों में संवेदनशीलता बेहद जरूरी होती है। उनका कहना है कि बड़े बैंकों की स्थापना से भारत की वित्तीय प्रणाली और अधिक मजबूत होगी और देश के विकास लक्ष्यों को गति मिलेगी हैं। कर्णाटक ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि लोगों, प्रक्रियाओं और तकनीक का सही एकीकरण ज़रूरी है। भारत में बैंकों की एसेट क्वालिटी पहले से ही बहुत अच्छी है, इसलिए यह किसी बड़ी चुनौती का विषय नहीं है। वहीं तिवारी ने जोड़ा कि किसी भी विलय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना आवश्यक है ताकि संगठन में सभी कर्मचारियों को समान अवसर महसूस हो।

कुल मिलाकर, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। जहां बड़ी पूंजी, तकनीकी दक्षता और मानव संसाधन के बेहतर प्रबंधन के साथ देश विश्वस्तरीय बैंकिंग शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाई गई, तो भारत अगले दो दशकों में वैश्विक बैंकिंग मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान हासिल कर सकता है।

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