By अभिनय आकाश | Jun 06, 2020
बिहार की सियासत ने कुछ साबित किया हो या न किया हो लेकिन ये साबित जरूर किया है कि सियासत में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। चेला कब गुरू बन जाता है, मोहरा कब वजीर और पुराने दोस्त कब दुश्मन बन जाते है और सहयोगी, प्रतिद्ववंदी में तब्दिल हो जाता है ये पता नहीं चलता है। बिहार में इस साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं और इस सियासी समर में रानीति के दांव-पेंच, नफा-नुकसान की गणित और राजनीतिक गतिविधियां जारी हो गई हैं। वैसे तो बिहार में चुनावी दंगल दो ही प्रमुख दलों के बीच है। एक तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन है तो दूसरी तरफ महागठबंधन। वैसे तो एनडीए में सबकुछ ठीक है ऐसा पूरी तरह से नहीं कह सकते क्योंकि बीते कुछ दिनों से उसके एक घटक दल के नेता चिराग पासवान ने जिस तरह के तेवर नीतीश सरकार के प्रति दिखाए हैं, उससे सारी आशंकाओं को बल मिलता है।
नीतीश संग मांझी
बिहार की राजनीति एक बड़ी करवट ले सकती है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार नीतीश कुमार जीतन मांझी के साथ पुरानी सियासी दुश्मनी को भुलाकर नयी शुरूआत करने को तैयार हैं। सूत्रों के अनुसार नीतीश कुमार अपना महादलित वोट बैंक मजबूत बनाए रखने के लिए जीतन मांझी को साथ रखना चाहते हैं। खबरों की माने तो नीतीश मांझी की पार्टी का जदयू में विलय करवा कर उनकी घर वापसी करवा सकते हैं।
ओबीसी विधायकों को तोड़ने का आरोप
जीतन राम मांझी लगातार तेजस्वी यादव पर हमलावर हैं। गोपालगंज हत्याकांड को लेकर मांझी ने कहा था कि तेजस्वी जगह चुनकर राजनीति कर रहे हैं। मर्डर सिर्फ गोपालगंज में ही नही आरा, जहानाबाद जैसी जगहों पर भी हत्याएं हुई हैं। ओबीसी मुद्दे पर भी जीतनराम मांझी ने ओबीसी विधायकों-नेताओं से तेजस्वी यादव के बहकावे में नहीं आने की अपील की थी।
तेजस्वी चल रहे अलग दांव
माना जा रहा है कि जीतन राम मांझी भले ही महागठबंधन में शामिल हो लेकिन तेजस्वी यादव विधानसभा चुनाव के पहले उन को अलग-थलग कर देना चाहते हैं। हार के दलित विधायक अब बट गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और जेडीयू नेता श्याम रजक के नेतृत्व में जिन दलित विधायकों ने आरक्षण के मुद्दे पर संघर्ष का ऐलान किया था अब वह पार्टी लाइन पर अलग हो गए। जीतन राम मांझी के आवास पर आज दलित विधायकों की बैठक बुलाई गई थी। लेकिन आरजेडी कोटे के दलित विधायक मांझी की बजाय तेजस्वी यादव के साथ बैठक करते नजर आए।