बिहार वोटर लिस्ट मामला- पटना से लेकर दिल्ली तक हंगामा जारी, सुप्रीम कोर्ट से निकलेगा समाधान?

By संतोष कुमार पाठक | Jul 25, 2025

बिहार में चुनाव आयोग द्वारा करवाए जा रहे वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) को लेकर राज्य की राजधानी पटना से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक हंगामा जारी है। पटना में राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व में विपक्षी इंडिया गठबंधन बिहार विधान सभा में लगातार इस मुद्दे को उठाकर एनडीए सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। वहीं देश की राजधानी दिल्ली में भी इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में हंगामा लगातर जारी है। मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी इंडिया गठबंधन जोर-शोर से इस मामले को लगातार उठा रही है लेकिन सरकार का स्पष्ट तौर पर यह कहना है कि एसआईआर अभियान चुनाव आयोग चला रहा है तो वह आयोग की तरफ से सदन में जवाब कैसे दे सकती है।

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लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा में उपसभापति हरिवंश लगातार, सदन की कार्यवाही को चलाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन विपक्षी दलों के जोरदार हंगामे के कारण इन दोनों को बार बार सदन की कार्यवाही को स्थगित करना पड़ रहा है।

सरकार और विपक्षी दलों के बीच जारी टकराव को देखते हुए अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर ही जाकर टिक गई है। लेकिन बड़ा सवाल तो यही खड़ा हो रहा है कि क्या वाकई सुप्रीम कोर्ट से समाधान का कोई रास्ता निकल पाएगा ? क्या सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई ऐसा ठोस फैसला दे पाएगा,जिसे हर हाल में चुनाव आयोग को मानना भी पड़े और जिससे सभी राजनीतिक दल संतुष्ट भी हो जाए ?

यह सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है क्योंकि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को मानने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में चलाए जा रहे एसआईआर अभियान के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 10 जुलाई को चुनाव आयोग को यह सुझाव दिया था कि वह वोटर लिस्ट को अपडेट करने के लिए मांगे जा रहे मान्य 11 दस्तावेजों की सूची में आधार कार्ड, वोटर कार्ड और राशन कार्ड को भी शामिल करने पर विचार करें। लेकिन चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 21 जुलाई को दायर किए गए अपने जवाबी हलफनामे में शीर्ष अदालत के इस सुझाव को मानने से इनकार कर दिया। अपने जवाबी हलफनामे में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को खारिज करते हुए कहा कि, "आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है और कई हाई कोर्ट ने भी इस बात को माना है।" आयोग ने 7 मार्च को सरकार द्वारा जारी किए गए एक प्रेस रिलीज का हवाला देते हुए (जिसमें केंद्र सरकार ने 5 करोड़ से ज्यादा फर्जी राशन कार्ड धारकों को हटाने की बात कही थी) दावा किया कि बड़े पैमाने पर फर्जी राशन कार्ड जारी किए गए हैं। वोटर कार्ड को मान्य दस्तावेजों की सूची में शामिल करने के सुझाव को भी खारिज करते हुए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वोटर आईडी कार्ड केवल वोटर लिस्ट की मौजूदा स्थिति की जानकारी देता है। इसलिए इसे वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए पहचान साबित करने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में यह भी दावा किया कि यह देखना उसका संवैधानिक अधिकार और दायित्व है कि मतदाता नागरिकता की आवश्यक शर्ते पूरी करते हैं या नहीं। हालांकि आयोग ने यह भी स्पष्ट करने का प्रयास किया कि वोटर के तौर पर अयोग्य ठहराए जाने के कारण किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त नहीं होगी।

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तथ्य का खासतौर से जिक्र किया था। ऐसे में अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हुई है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत अगली सुनवाई में इस मामले पर कोई ठोस फैसला दे पाएगी जो आने वाले दिनों में एक उदाहरण का काम करें ? सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी। बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव के बहिष्कार तक करने के बारे में सोचने वाले बयान के मद्देनजर भी यह मामला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। लोकतंत्र की आत्मा को जीवित बनाए रखने और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को साबित करने के लिए इस मामले में एक ठोस फैसले का आना अब बहुत जरूरी हो गया है। 

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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