BIMSTEC देशों ने दिल्ली में सुर और ताल मिलाकर पश्चिमी देशों को बड़ा 'संदेश' दे दिया है

By नीरज कुमार दुबे | Aug 05, 2025

भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित बिम्सटेक पारंपरिक संगीत महोत्सव 'सप्तसुर' केवल एक सांस्कृतिक आयोजन भर नहीं था, बल्कि यह आयोजन भारत की उभरती हुई बहुपक्षीय कूटनीतिक दृष्टि, क्षेत्रीय नेतृत्व और सांस्कृतिक रणनीति का एक सशक्त प्रदर्शन था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के उद्घाटन भाषण ने इस आयोजन को केवल सुर और ताल के उत्सव से कहीं आगे, नई वैश्विक व्यवस्था की खोज का मंच बना दिया।

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भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में जयशंकर ने अपने भाषण में यह स्वीकार किया कि “हम जटिल और अनिश्चित समय में जी रहे हैं”, और इसी पंक्ति में उन्होंने यह जोड़ा कि दुनिया एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की तलाश में है जो ‘कुछ शक्तियों के प्रभुत्व’ से मुक्त हो। यह वक्तव्य अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी वर्चस्व, खासकर अमेरिका और उसके गठजोड़ों की वैश्विक संस्थाओं में मनमानी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह है। इस संदर्भ में बिम्सटेक जैसे मंच भारत को एक गैर-पश्चिमी क्षेत्रीय नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करते हैं— जहां समान विचारधारा वाले देश संस्कृति, परंपरा और क्षेत्रीय समरसता के ज़रिये वैश्विक राजनीति में पुनर्संतुलन का प्रयास कर सकते हैं।

जयशंकर का यह कहना कि “हमारी परंपराएं हमारी पहचान को परिभाषित करती हैं” भारत की उस कूटनीतिक रणनीति की ओर संकेत करता है जो संस्कृति के माध्यम से राष्ट्र की पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करना चाहती है। यह वही सोच है जिसके तहत योग दिवस, अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष, खादी प्रचार, और अब यह संगीत महोत्सव वैश्विक मंचों पर भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति को गहरा कर रहे हैं।

हम आपको बता दें कि बिम्सटेक के सात सदस्य— बांग्लादेश, भारत, म्यांमा, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल और भूटान भू-राजनीतिक दृष्टि से भारत के लिए एक सुरक्षा, व्यापार और संस्कृति का सेतु हैं। चीन के आक्रामक रवैये और सार्क की निष्क्रियता के बीच बिम्सटेक का सशक्तिकरण भारत की पूर्वी सीमा पर एक नया सहयोगात्मक गढ़ बना रहा है। ‘सप्तसुर’ के माध्यम से भारत ने यह संकेत दिया कि वह न केवल सुरक्षा और व्यापार का नेतृत्व करेगा, बल्कि सांस्कृतिक नेतृत्व के लिए भी तैयार है।

बहरहाल, ‘सप्तसुर’ कोई सामान्य सांस्कृतिक आयोजन नहीं था; यह था भारत की उस रणनीति का सार्वजनिक संस्करण जो सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से वैश्विक सत्ता-संतुलन में अपनी भूमिका को मजबूत करना चाहती है। एस. जयशंकर का भाषण इस बात का संकेत था कि भारत “संयुक्त राष्ट्र से लेकर संगीत महोत्सव तक”, हर मंच पर एक अधिक न्यायसंगत, संतुलित और बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था की पैरवी करेगा। जहां अन्य देश कूटनीति को केवल सैन्य या व्यापार तक सीमित रखते हैं, भारत ने यह दिखा दिया कि सांस्कृतिक विरासत भी वैश्विक शक्ति निर्माण का एक सशक्त उपकरण हो सकती है।

हम आपको यह भी बता दें कि बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल (बिम्सटेक) एक क्षेत्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 1997 में बैंकॉक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी। शुरुआत में बिस्टेक (बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका, थाईलैंड आर्थिक सहयोग) के नाम से जाना जाने वाला यह संगठन अब बिम्सटेक के नाम से जाना जाता है और इसमें सात सदस्य देश शामिल हैं। इस संगठन में 1997 में म्यांमा और 2004 में भूटान और नेपाल को भी शामिल किया गया। बहरहाल, आइये देखते हैं समारोह का हिस्सा बनने आये विभिन्न देशों के लोगों की प्रतिक्रियाएं।

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