झांसी मेरी है, अपनी झांसी किसी को नहीं दूँगी। जो लेना चाहे आए, मैं उसे देख लूंगी

By शिवकुमार शर्मा | Jun 18, 2022

यह वाक्यावली जिनकी स्वाधीनता का मूल मंत्र था, यह जिनके स्वाभिमान का परिचय था, ये थीं श्री मोरोपंत ताम्बे और श्रीमती भागीरथी वाई की लाडली पुत्री मणिकर्णिका, प्यार से "मनु" और नाना के यहां "छबीली", झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ व्याही जाने पर महारानी लक्ष्मी बाई और 18 जून 1858 ई. के बाद झांसी वाली रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई। उनका जन्म 19 नवंबर 1835 में काशीपुरी में हुआ था। मनु जब 3 वर्ष की थी तब मां का निधन हो गया था। मनु के पिता श्री मोरोपंत ताम्बे बाजीराव द्वितीय के भाई चिमनाजी अप्पा के यहां सेवाएं देते थे, उसी से परिवार का निर्वाह होता था चिमनाजी अप्पा का निधन हो जाने से मोरोपंत ताम्बे की सेवाएं भी समाप्त हो गई, जिससे परिवार आर्थिक विपन्नता से जूझने लगा। मोरोपंत ने जीवन निर्वाह के लिए बाजीराव के यहां काम करना आरंभ कर दिया था। बाजीराव ने मनु की शिक्षा दीक्षा का भार अपने ऊपर लिया और अपने दत्तक पुत्र धून्धूपंत के साथ ही मनु की शिक्षा दीक्षा का भी बंदोबस्त कर दिया। मनु अश्वारोहण, अस्त्र शस्त्र चलाने और युद्ध विद्या में पारंगत हो गई। इसके कारण ही बाजीराव ने मनु का विवाह गंगाधर राव नेवालकर के साथ करने में सफल हुए।

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संग्राम शुरू हो गया ह्यूरोज के दांत खट्टे कर दिए। रानी ने किले पर गरगज, घनगर्ज, कड़क बिजली और भवानी शंकर तोपें रखवा दी थी। अंग्रेजों ने झांसी के किले पर गोली बरसाना शुरू किया। रानी ने उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया। 14 मार्च 1858 से 8 दिन तक लगातार तोपों से गोले बरसती रहे। रानी की मुट्ठी भर सेना ने रानी को सलाह दी कि वह कालपी की ओर चली जाए। झलकारी बाई और मुंदर सखियों ने भी रणभूमि अपना कौशल दिखाया। अपने चार पांच सैनिकों को लेकर रानी कालपी की ओर बढ़ी। कैप्टन बॉकर ने पीछा किया और उन्हें घायल कर दिया। 22 मई 1858 को क्रांतिकारियों को कालपी छोड़कर ग्वालियर जाना पड़ा। 17 जून को1858 को फिर युद्ध हुआ रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेज पीछे हट गए। महारानी की विजय हुई। 18 जून 1858 को ह्यूरोज और स्मिथ स्वयं युद्धभूमि आ गये। रानी ने दामोदर राव को रामचंद्र देशमुख को सौंप दिया। 18 जून 1858 को स्वर्णरेखा नाले को रानी का घोड़ा पार नहीं कर सका । वही एक सैनिक ने पीछे से रानी पर तलवार से ऐसा जोरदार प्रहार किया कि उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और आंख बाहर निकल आई। उनके अंग अंग से खून  बह रहा था। रानी के अंतिम  वाक्य यही थे कि "मेरी मृत्यु एक वीरांगना की तरह से हुई। मुझे ये म्लेच्छ न जीवित अवस्था में ही पकड़ सकें न मेरे मरने के उपरांत ही पकड़ने पायें"

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घायल होते हुए भी उन्होंने उस अंग्रेज सैनिक का काम तमाम कर दिया। रानी की हालत देखकर उनके विश्वासपात्र सरदार रामचंद्र राव उन्हें उठाकर गंगादास की कुटिया में ले आए वही महारानी मैं प्राण त्याग दिए वहीं चिता बनाकर उनका अंतिम संस्कार किया गया। गौरवमई बलिदानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हुए मातृभूमि के लिए अंतिम सांस तक लड़कर प्राणाहुति देने वाली प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अमर कथा की देवी हिंदुस्तान की माटी के कण-कण में समा गई। उनके पुण्य स्मरण के बिना मातृभूमि को दी जाने वाली हमारी सलामी अधूरी रहेगी।

वीरांगना शौर्य प्रतिमा को, सहज शीश झुक जाता है, 

कण-कण करता वंदन उसका ,रोम-रोम यस गाता है। 

बलिदानी लक्ष्मीबाई को, कृतज्ञ राष्ट्र का नमन सदा, 

अमर तेरा उत्सर्ग त्याग गौरव इतिहास सुनाता है।।

स्वतंत्रता की परम उपासक वीरांगना लक्ष्मीबाई को शत शत नमन।

- शिवकुमार शर्मा

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