बिखरती कांग्रेस को सोनिया ने बचाकर बनवाई थी केंद्र में सरकार, पार्टी को फिर से है उनके हौसलों की दरकार

By अनुराग गुप्ता | Dec 07, 2021

नयी दिल्ली। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी सबसे लंबे समय तक ग्रैंड ओल्ड पार्टी की अध्यक्षा रहीं। हालांकि फिर उनके बेटे को अध्यक्ष चुन लिया गया था लेकिन आम चुनाव में मिली हार के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बन गईं। कांग्रेस के दिग्गज नेता सीताराम केसरी के अध्यक्ष रहते हुए गांधी परिवार के वफादारों ने सोनिया गांधी को अपना अध्यक्ष मान लिया था और उन्हीं की रणनीति में आगे बढ़ना चाहते थे लेकिन अपनी सास और अपने पति की हत्या देखने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखने से इनकार कर दिया था और बाद में फिर एनडीए की सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने का काम किया था।17 साल बाद ली थी नागरिकताफोर्ब्स की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में कई बार जगह बना चुकी सोनिया गांधी का जन्म इटली के वैनेतो में स्थित छोटे से गांव लूसियाना में एक साधारण परिवार में हुआ था। उस वक्त उनके पास इटली की सदस्यता थी और उनका नाम अंटोनिआ एडवीज अल्बिना मायनो था। लेकिन 1965 में अंटोनिआ एडवीज अल्बिना मायनो की मुलाकात एक रेस्त्रां में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी से हुई। उस वक्त राजीव गांधी कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच मुलाकातों का दौरे शुरू हुआ और देखते ही देखते साल 1968 में राजीव गांधी ने अंटोनिआ एडवीज अल्बिना मायनो से शादी की। जिसके बाद उनका नाम अंटोनिआ एडवीज अल्बिना मायनो से सोनिया गांधी हो गया। हालांकि 17 साल बाद 1983 में उन्होंने भारत की नागरिकता ली। लेकिन विदेशी मूल का मुद्दा हमेशा से 'जिन्न' की तरफ उनके पीछे घूमता रहा।1996 के आम चुनाव में मिली थी हार1996 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस वक्त देश की राजनीति काफी नाटकीय मोड से गुजर रही थी। यह वही समय है जब अटल बिहारी वाजपेयी महज 13 दिनों तक सरकार में रहे। इसके बाद एचडी देवेगौड़ा और फिर इंद्रकुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री बने। जहां दूसरी तरफ पार्टियां सरकार बनाने में जुटी हुईं थीं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गांधी परिवार खुद को असहज महसूस कर रहे थे। जिसके बाद फिर से वफादारों ने 10 जनपथ का दरवाजा खटखटाया और सोनिया गांधी को अपना अध्यक्ष मान लिया। हालांकि 1998 में सोनिया गांधी ने पार्टी की जिम्मेदारी को संभाल भी लिया।उस वक्त उन्होंने कहा था कि मैं नहीं चाहती थी कि राजीव राजनीति में आएं, लेकिन उन्हें इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आना पड़ा। इसी तरह मैं भी राजनीति में नहीं आना चाहती थी लेकिन मुझे भी मजबूरी में आना पड़ा। जब मैं राजनीति में आई कांग्रेस मुश्किल में थी। ऐसे में अगर मैं राजनीति में नहीं आती तो लोग मुझे कायर समझते।एक वक्त ऐसा भी था जब राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी से पूछे बिना उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा कर दी थी लेकिन सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से इनकार कर दिया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूंगी लेकिन मैं राजनीति में कदम नहीं रखूंगी।एनडीए सरकार को उखाड़ फेंकासाल 2004 के आम चुनाव में भाजपा का इंडिया शाइनिंग वाला नारा फेल हो गया और यूपीए की वापसी होने जा रही थी। नाम चलने लगा कि सोनिया गांधी अगली प्रधानमंत्री होंगी लेकिन विपक्ष ने विदेशी मूल का मुद्दा उठाया। उस वक्त भाजपा की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि अगर सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी तो मैं अपना सिर मुडवा लूंगी। हालांकि यूपीए की बैठक में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया और उनके इस फैसले से हर कोई चौंक गया। साल 2004 के बाद 2009 में भी सोनिया गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और मनमोहन सिंह फिर से प्रधानमंत्री बने लेकिन 2014 में मोदी लहर के सामने कांग्रेस टिक नहीं पाई और बड़े से बड़ा नेता चुनाव हार गया लेकिन सोनिया गांधी न सिर्फ 2014 बल्कि 2019 में भी रायबरेली से सांसद चुनी गईं।बिखर रही है कांग्रेसपरिवार की जिम्मेदारी संभालने की बात करने वाली सोनिया गांधी को एक बार फिर से बिखरती हुई कांग्रेस को संभालना होगा। लेकिन पार्टी तभी संभल सकती है जब उनके नेताओं को सुना जाए। क्योंकि कांग्रेस के 23 नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल खड़ा करते हुए सोनिया गांधी को पत्र लिखा था। जिन्हें जी-23 का नाम दे दिया गया। यह 23 नेता पार्टी के कामकाज से और वफादारों के पार्टी छोड़ने से नाराज हैं। सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह को मिलाकर 26 नेताओं ने अबतक कांग्रेस का साथ छोड़ दिया।

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