By अभिनय आकाश | May 08, 2026
कोई खिलाड़ी जो अप्रत्याशित रूप से एक अधिक मजबूत प्रतिद्वंद्वी को हरा देता है तो उसे जायंट किलर कहलाता है। राजनीति में भी ऐसे ही नाम हैं। वर्तमान के संदर्भ में बात करें तो जिसे बीजेपी ने बंगाल का ताज सौंप दिया है। पीछे मुड़कर देखें तो सुब्रत पाठक कन्नौज में डिंपल यादव को हराया था। स्मृति ईरानी जिन्होंने राहुल गांधी को अमेठी में हराया। केपी यादव ने गुणा में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मात दी। 70 के दशक में एक जायंट किलर बने थे जार्ज फर्नांडीज जिन्होंने उस वक्त के कांग्रेस के कद्दावर नेता एसके पाटिल को बंबई दक्षिण लोकसभा सीट से हराया था। लेकिन इस कहानी के बीच में कहानी उस जॉइंट किलर की है जिसने ममता को 2021 में भी पटका था और 2026 में ना सिर्फ उन्हें हराया बल्कि उनके किले को धस कर दिया। यह कहानी है शुभेंदु अधिकारी की। वो शुभेंदु जो कभी ममता के बेहद करीबी थे और इस बार भवानीपुर में 15105 वोटों के अंतर से हराकर इतिहास रच। लेकिन ये कहानी 2026 की नहीं है। ये कहानी पुरानी है। 2020 के इस्तीफे की है। 2021 में ममता के खिलाफ नंदीग्राम में चुनाव लड़ाई की है। 2021 में ममता को 1956 वोटों से हराने की है। जब यह बताया उन्होंने सारी दुनिया को कि ममता अपराजित नहीं है। वह हार सकती हैं। उन्हें भी बंगाल में हराया जा सकता है और पिछली बार हराया था बस प्रदेश में नहीं हरा पाए लेकिन इस बार लहर नई सुनामी आई और उस सुनामी ममता के साथ-साथ टीएमसी के पंख जो थे फूल के वो भी उड़ गए शुभेंदु अधिकारी जो ममता के करीबी थे सिर्फ मानो पाला नहीं बदला बल्कि अपने साथ वो सत्ता का वो कोहिनूर भी छीन कर ले आए जिसके दम पर पूरा तंत्र चमक रहा था और वैसे भी जब घर का वास्तुकार बागी हो जाए तो इमारत की मजबूती जो है वो सिर्फ भ्रम में रह जाती। इसी याश कहानी जॉइंट किलर की है। नंदीग्राम से लेकर भवानीपुर में इस जॉइंट किलर ने जो कुछ किया वो ममता बनर्जी के अहंकार पर चोट है। स्वाभिमान पर चोट है।
साल 2026 के जो आंकड़े सामने आए वो रातोंरात करिश्मा नहीं है। अटल जी ने एक बार कहा था कि रातों-रात कुरमुत्ते की तरह थोड़ी ना हुए हैं। इसके पीछे लंबा संघर्ष हा। शुभेंदु अधिकारी का भी संघर्ष है। पहले ममता के फॉलोअर होकर संघर्ष था। 19 दिसंबर 2020 को उन्होंने इस्तीफा दिया था और उसके बाद से बीजेपी में उनका संघर्ष हुआ। शुभेंदु क्योंकि ममता की पार्टी में थे इसलिए जानते थे किस बूथ पर कौन सा पेंच ढीला है। किस कार्यकर्ता के मन में आग सुलग रही है। अगर आप शुभेंदु अधिकारी के हलफनामों में उनके मुकदमों की लंबी लिस्ट देखेंगे तो आप भी समझ जाएंगे कि ये खाली मोदी जी की वजह से नहीं हुआ है। शाह साहब की वजह से नहीं हुआ है। इस लड़ाई को लड़ने के लिए शुभेंदु ने भी पसीना बहाया है। उनकी इनाइडर नॉलेज ने दिखाया है। कैसे सत्ता की सबसे मजबूत कड़ी कई बार सबसे बड़ी कमजोरी बनती है। वैसे भी राजनीति में अक्सर कहते हैं कि दुश्मन को हराने के लिए जानना जरूरी है। शुभेंदु ने तो बताया कि दुश्मन को हराने के लिए उसे बनाना और फिर उसके गलतियों को सामने लाना कहीं ज्यादा कारगर है। उन्होंने मेदनीपुर से लेकर जंगलमहल तक फैले अपने पुराने नेटवर्क का इस्तेमाल कर उस बूथ मैनेजमेंट को ही हैक कर लिया जो ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत थी। इसीलिए यह जीत यह साबित करती है कि रणनीतिकार अगर बागी हो गया तो वो केवल चुनाव नहीं जीतता। इतिहास का रुख मोड़ देता है।
इसकी शुरुआत 2021 में हुई थी। नंदीग्राम की जीत वो जीत जिसको लेकर सवाल उठा था कि क्या वो डर का अंत है? 2021 में जब शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया था तो वो एक मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत थी। जिसने बंगाल के फियर फैक्टर को पहली बार एक्सपोज किया। अगर आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उस दिन शुभेंदु अधिकारी की 10,956 वोटों से जीत असल में बंगाल के उस खौफ के अंत की शुरुआत थी जिसकी बुनियाद 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में रखी गई। शुभेंदु ने ममता बनर्जी के उस अजय होने के नैरेटिव पर प्रहार किया और बंगाल की जनता को पहली बार लगा कि भाई कोई है जो ममता को भी हरा सकता है। 5 साल में संघर्ष रहा, लड़ाई, झगड़ा, हमला सब हुआ। लेकिन 26 आते-आते वो लहर जो है वो सुनामी में तब्दील हुई। जनसैलाब बन गई। 92% से अधिक मतदान हुआ। शुभेंदु ने साबित किया कि अगर रणनीति जमीन से जुड़ी और आप 5 साल डटे हैं तो आप जनता का विश्वास जीत सकते हैं और जीतकर आप जॉइंट किलर बन सकते हैं और इसीलिए उस दौर में नंदीग्राम की जीत ने सिखाया था कि अगर राजा को उसके आंगन में चुनौती दी जाए और वहां से खदेड़ा जाए तो सेना का मनोबल टूटता है। 26 के नतीजों में दिखने वाला प्रचंड बहुमत असल में उसी 2021 की नंदीग्राम वाली मनोवैज्ञानिक जीत का असर है। जनता ने देखा जिस चेहरे के सामने कोई खड़ा नहीं होता था। अब उसके घर में घुसकर उसको चुनौती दी जा रही है और यहीं से वो डर खत्म और जब डर खत्म होता है और लोकतंत्र में जनता ताकतवर बनती है तो बड़ी बेबाक हो जाती है। वो अपना हित सोचती है और कई बार राजाओं का हित हो जाता है जैसे ममता का।