By अभिनय आकाश | Mar 10, 2022
सूबे में पहले के मुकाबले इस बार का चुनाव कई मायनों में अलग था। मुद्दा न राम मंदिर था। न जात-पात। न बिजली-सड़क। बिल्कुल अलग तरह के मुद्दे थे। मुद्दा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का गुस्सा था। महंगाई का था। कहा जा रहा था कि जाटों की नाराजगी का खामियाजा बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उठाना पड़ेगा। लेकिन वास्तविकता इससे ठीक उलट नजर आई। निरस्त किए गए कृषि कानूनों के खिलाफ साल भर के किसानों के आंदोलन के बावजूद, बीजेपी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 66 सीटों में से 35 सीटों पर शाम करीब 6 बजे आगे चल रही थी। हालांकि, सपा बीजेपी को कड़ी टक्कर देती दिखी और इस क्षेत्र की 31 सीटों पर आगे चल रही थी। यूपी में सत्तारूढ़ दल 2022 के विधानसभा चुनावों में पश्चिमी यूपी में अपनी आसन्न हार के बारे में चुनाव पूर्व की बातचीत को धता साबित करने में कामयाब रहा। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन दोहराने में वो कामयाब साबित नहीं हो पाई। बीजेपी ने 2017 विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र में 51 सीटें जीती थीं।
हालांकि, यह योगी आदित्यनाथ सरकार के तहत राज्य में कानून और व्यवस्था में सुधार और "डबल-इंजन" की सरकार द्वारा शुरू की गई लाभार्थी योजनाओं (जैसे गरीबों और बेरोजगारों के लिए मुफ्त राशन और वित्तीय सहायता) के भाजपा के दावे कारगर साबित हुए। केंद्र और राज्य में योगी सरकारों ने मतदाताओं को बीजेपी के पक्ष में रखा है।
जाट फैक्टर ने नहीं की रालोद की मदद
जबकि जाट कथित तौर पर पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में आबादी का 18 प्रतिशत है, और भाजपा ने अतीत में जाट वोटों पर नजर रखते हुए यहां रालोद के साथ गठबंधन किया था। जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। 2014 से चुनावों में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद वोटों का ध्रुवीकरण हुआ। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के आंकड़ों के मुताबिक, 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में सिर्फ सात फीसदी जाटों ने बीजेपी को वोट दिया था. 2014 (लोकसभा चुनाव) में यह संख्या बढ़कर 77 प्रतिशत और 2017 (यूपी चुनाव) में 91 प्रतिशत हो गई।