विकासजी की मेहरबानियां (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 04, 2023

बात में दम होना चाहिए, जैसे उन्होंने स्पष्ट कहा कि गाली और अश्लीलता बर्दाश्त नहीं की जा सकती। शायद किसी ने उन्हें बताया नहीं वहां, यहां और कहां कहां जो भी परोसा जा रहा, बरसों से खूब पचाया जा रहा है। माहौल के मुताबिक़ जिस तरह ओटीपी ज़रूरी है उसी तरह ओटीटी भी ज़रूरी हो गया है। जिस तरह वन टाइम पासवर्ड से कई सुरक्षित दरवाज़े खुल जाते हैं उसी तरह ओटीटी पर मनोरंजन की अनेक ‘स्वादिष्ट’ खिड़कियां खुल जाती हैं। 


आम आदमी को सार्वजनिक रूप से गाली देने और लेने, अश्लीलता का हिस्सा होने की इजाज़त नहीं होती लेकिन सामाजिक, धार्मिक और राजनीति के ख़ास लोग तो कहीं भी गालियां देने के लिए नैतिक रूप से अधिकृत होते हैं। उन्होंने तो गालियों की परिभाषा बदल दी है। जैसे कैसे चुन कर आए नेता तो विधानसभा में भी अश्लील वीडियोज देखने के हकदार होते हैं। इतना ही नहीं वे तो वास्तविक रूप से इंसानी शरीर तोड़ने फोड़ने, तलवारें लहराने, गोली चलाने, खून बहाने, मारने के लिए भी अधिकृत होते हैं। वे चाहें तो संविधान, संसद, लोकतंत्र, देशभक्ति को भी पूरी तहजीब के साथ गाली देकर बाद में कह सकते हैं हमारा मतलब यह नहीं था। 

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ओटीटी पर जो गालियां, मारकाट, खून खराबा, सेक्स और जिस्म दिखाया जा रहा है उसमें सृजनात्मक, कलात्मक, सिनेमाई व मनोरंजक दृष्टिकोण का घालमेल है। जहां तक स्वतंत्र रूप से कुछ करने की बात है तो हर व्यक्ति के लिए अलग सीमाएं होती हैं, ठीक उसी तरह से जैसे नंगे, बेशर्म होने की अपनी अपनी हद है। जिस लायक व्यक्ति को पता है कि उसके अपशब्द, गालियां और खुराफातें तालियां बजवाएंगी वह ऐसा करेगा ही। जिस नालायक के पास गालियां, लातें, अपशब्द सहने के इलावा कोई चारा नहीं है वह उनका खुले शरीर और मन से स्वागत करेगा।  


वैसे, सुरक्षात्मक तरीका अपनाते हुए, गाली लिखकर दी जा सकती है। प्रभाव और सम्प्रेषण में कोई कमी नहीं आने वाली। गाली देने वाला आंखें तरेर कर, मुक्का दिखाकर, सिर्फ होटों में दे सकता है। यह एक सभ्य और नया तरीका हो सकता है। इसमें प्रावधान यह होना चाहिए कि प्राप्त करने वाला समझदारी से गाली प्राप्त कर ले। इस बहाने सृजन के नए आयाम तय होंगे। दरअसल सामाजिक सफलता प्राप्त करने के बाद कई तरह की अश्लीलता ने शालीनता को बहुत तंग कर रखा है। देखा जाए तो अश्लीलता को भी खुले दिमाग और नए अर्थों में लेने की ज़रूरत है।  


ज़िंदगी में परेशानियां बढ़ती जा रही हैं, संघर्ष फैलता जा रहा है। सुबह घर से निकलने से रात को लौटने तक आम इंसान अपने शरीर, मन, यातायात और भीड़ से जूझ रहा होता है। उसे तेज़ी से मिलने वाला आराम भी चाहिए। विकासजी ने हाथ में फोन थमाकर स्मार्ट बनाते हुए, डिजिटल स्वतंत्रता देकर उसके अमन और चैन पर कब्ज़ा कर लिया है। विकासजी सक्रिय न होते तो न ओटीपी होता न ओटीटी। सच तो यह है कि ज़्यादा आजादी भी खराब ही करती है। आप दो इंच देते हो, लेने वाला सात इंच चाहता है और स्वतंत्रता की दुहाई देते देते दस इंच ले लेता है। 

 

गाली का क्या है, यह तो हमेशा समाज का अंग रही हैं। सिर्फ अंदाज़ ए बयां में फर्क पड़ता रहा। असभ्यता का क्या है सभ्यता से पहले सिर्फ अ ही तो लगाना है। अश्लीलता ने भी तो विकसित होना है। विकासजी के शासन में हर कुछ विकसित होना है।

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