जन्म से नेत्रहीन रविन्द्र जैन ने अपने जादुई संगीत के दम पर लोगों को झूमने पर किया था मजबूर

By अनन्या मिश्रा | Feb 28, 2023

मधुर धुनों की लंबी फेहरिस्त रवींद्र जैन के नाम से जुड़ी है। फन्होंने उस दौर में दुनिया को सुरीले नगमों की सौगात दी, जब फिल्मों में गानों की गुंजाइश काफी कम होती थी। इस दौर में रवींद्र जैन ने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। रवींद्र जैन एक ऐसा नाम था, जिसने गीतकार, संगीतकार और गायक के तौर पर हिंदी सिनेमा को बेशुमार सदाबहार गानों को दिया। आपको बता दें कि आज ही के दिन यानि की 28 फरवरी को रवींद्र जैन का जन्म हुआ था। वह जन्म से ही नेत्रहीन थे। आज हम आपको उनके जन्मदिन के मौके पर उनकी जिंदगी और स्ट्रगल के दिनों से रूबरू करवाएंगे।

अलीगढ़ में संस्कृत के पंडित और आयुर्वेद विज्ञानी इंद्रमणि जैन की संतान के रूप में 28 फरवरी, 1944 को रवींद्र जैन का जन्म हुआ था। रवींद्र जैन सात भाई-बहन थे। बता दें कि जन्म से नेत्रहीन होने के कारण उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के ब्लाइंड स्कूल से पढ़ाई की। वहीं महज 4 साल की उम्र से उनके पिता ने उन्हें संगीत सिखाने की व्यवस्था कर दी। संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह शिक्षक के तौर पर कोलकाता चले गए। इस बीच जब उन्होंने गायक के तौर पर अपनी पहचान बनानी चाही तो देश के पांच रेडियो स्टेशनों ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया था।

स्ट्रगल

इसी दौरान कोतकाता में रहने वाले उनके गुरू राधे श्याम झुनझुनवाला एक फिल्म बनाना चाहते थे। इसके लिए वह रवींद्र को साल 1969 में अपने साथ मुंबई ले गए। यहां पर झुनझुनवाला ने लोरी फिल्म बनाई और 1971 में रवींद्र जैन ने अपना पहला गीत रिकॉर्ड करवाया। इस गाने के बोल थे 'ये सिलसिला है प्यार का चलता ही रहेगा'। इसके बाद लोरी फिल्म के लिए रवींद्र जैन ने मंगेशकर से साथ 4 गीत और आशा से 1 गाना गवाया। हालांकि यह फिल्म पूरी नहीं हो सकीष लेकिन इसके बाद भी रवींद्रन जैन इस बात पर खुश थे कि पहली फिल्म में रफी, लता और आशा जैसे दिग्गजों ने गाना गाया।

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पहली फिल्म

काफी प्रयासों के बाद रवींद जैन के संगीत निर्देशन में कांच और हीरा फिल्म रिलीज हुई। इस फिल्म में भी रवींद्र जैन ने रफी साबह से एक गीत गवाया। लेकिन यह फिल्म फ्लॉफ हो गई। इसके बाद भी रवींद्र जैन ने हार नहीं मानी। साल 1973 में राजश्री प्रोडक्शन में बनी फिल्म सौदागर ने रवींद्र की किस्मत के दरावजे खोल दिए। इस फिल्म के गाने 'तेरा मेरा साथ रहे' और 'सजना है मुझे' आज भी लोग गुनगुनाते हैं। इसके बाद साल 1974 में उन्हें चोर मचाए शोर में मौके मिला। इस फिल्म में उन्होंने किशोर कुमार से गीत गवाया। इसके बाद रवींद्र जैन के संगीत से सजी चितचोर और अंखियों के झरोखे ने सभी को झूमने पर मजबूर कर दिया।

गानों का सिलसिला

इसके बाद रवींद्र जैन ने हिंदी सिनेमा को एक के बाद एक कई गाने दिए। इस दौरान साल 1975 में गीत गाता चल, 1976 में चितचोर, 1977 में श्याम तेरे कितने रंग,  1978 में अंखियों के झरोखे से, 1977 में दुल्हन वही जो पिया के मन भाए और 1982 में नदिया के पार तक के इस सफर में रवींद्र जैन ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक रसपूर्ण गाने दिए। वहीं आज भी गानों का जादू लोगों पर बरकरार है। उनके द्वारा लिखे गए गीतों के दम पर फिल्में न सिर्फ हिट बल्कि सुपर हिट हुईं।

अवॉर्ड

रवींद्र जैन को चितचोर के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। 1978 में फिल्म 'अखियों के झरोखों से' के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन और फिल्म के शीर्षक गीत 'अंखियों के झरोखों से' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। साल 1985 में राम तेरी गंगा मैली में संगीत दिए जाने के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक औक साल 1991 में फिल्म हिना के गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

आखिरी समय तक नहीं रही काम की कमी

रवींद्र जैन को इस बात का एहसास था कि फिल्मी जगत में उगता हुआ सूरज एक न एक दिन डूबता जरूर है। अस्सी के दशक के बीच में खय्याम, नौशाद और रवि जैसे की बड़े संगीतकार अपना परचम लहरा रहे थे। तब रवींद्र जैन ने धारावाहिकों में संगीत देने का सिलसिला शुरू कर दिया। अपने सफलतापूर्ण करियर के तीस साल बाद बी उन्हें काम की कमी नहीं रही। इसके अलावा उन्होंने गजलें भी लिखीं। लेकिन वक्त ने उनका साथ छोड़ने का फैसला कर लिया था। किडनी की बीमारी से दो साल तक जूझने के बाद 9 अक्टूबर 2015 को यह महान गीतकार दुनिया को अलविदा कह गया।

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