Book Review: PM मोदी के तमाम सपनों और सरकार के उत्कृष्ट कार्यों का विहंगावलोकन करती एक किताब

By गिरीश पंकज | Jun 23, 2023

सक्रिय पत्रकारिता की लंबी पारी खेलने के बाद अब मीडिया-गुरु के रूप में सुपरिचित प्रो. संजय द्विवेदी समकालीन विषयों पर निरंतर लिखते रहे हैं। इनका राष्ट्रवादी टोन आकर्षित करता है। बिना किसी की परवाह किए संजय ऐसे विषय भी उठाते हैं, जिनको लेकर कुछ लोग उनकी आलोचना भी करते हैं, लेकिन ध्येयवादी इस लेखक-पत्रकार ने कभी ऐसे तत्वों की परवाह नहीं की और जो सच है और जो लिखा जाना चाहिए, उस पर बाकायदा कलम चलाई। अपनी प्रतिबद्ध वैचारिक लाइन पर चलते हुए पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया संबंधी तीन हजार से भी अधिक लेख लिखने वाले संजय की नई पुस्तक भी कमाल की है। इस लेखक की पिछली पुस्तक 'भारतबोध का नया समय' भी काफी चर्चित रही और अब यह 'अमृतकाल में भारत'। इस पुस्तक में प्रो. संजय ने केंद्र सरकार के कुछ अभिनव कार्यों पर अपनी सकारात्मक दृष्टि डाली है। इसमें दो राय नहीं कि आजादी के अमृत महोत्सव को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने जनहित में कुछ उत्कृष्ट कार्य किए। कुछ अभूतपूर्व निर्णय लिए, इन सबका सारगर्भित विश्लेषण समीक्ष्य पुस्तक में मिलता है। लेखक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नये भारत के शिल्पकार और राष्ट्रनायक के रूप में अपनी पुस्तक समर्पित की है।

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समीक्ष्य पुस्तक में अनेक जगह आँकड़ों के माध्यम से भी देश के विकास को दर्शाया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि अमृतकाल में आने वाले पच्चीस सालों के विराट संकल्प भी हैं। कोई भी राष्ट्र क्यों वर्तमान में नहीं जीता। वह अपने भविष्य के एजेंडे भी तय करता है। मोदी सरकार ने आने वाले पच्चीस सालों की भी चिंता की है। उस समय देश आजादी की शताब्दी मनाएगा, तब का भारत कैसा होगा, इसकी चिंता अमृतकाल में करना और उसके अनुरूप कदम उठाना बड़ी बात है। 'राष्ट्र सर्वोपरि' और 'कर्मभोगी नहीं, कर्मयोगी बनें' नामक अध्याय में प्रो. द्विवेदी ने प्रधानमंत्री के कर्मठ जीवन के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला है। सरकारी कर्मचारी अपनी सेवा को सिर्फ सरकारी न समझे, वरन देश की विकास यात्रा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका समझकर कार्य करें। प्रधानमंत्री यही भाव जाग्रत करना चाहते हैं। उनके विचारों को अनेक उदाहरणों के साथ लेखक ने लिपिबद्ध किया है। लोकतंत्र एवं समाज, संवाद और संचार, विकास के आयाम, विज्ञान एवं तकनीक, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, भाषा नामक विभिन्न अध्यायों में लेखक ने प्रधानमंत्री के नवाचारों और संकल्पों को सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया है। लेखक ने 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति: बदलाव की बुनियाद' में नई शिक्षा को लेकर प्रधानमंत्री ने जो कुछ सुधार किए, उसका विस्तृत विवरण दिया है। जैसे शिक्षा मंत्रालय ने 'दीक्षा' प्लेटफार्म शुरू किया। इसका 'स्वयं' नामक पोर्टल को तेईस करोड़ हिट्स मिले। इसी से समझा जा सकता है युवा पीढ़ी के लिए यह पोर्टल कितना उपयोगी रहा।' बेटा-बेटी एक समान' नामक अध्याय में लेखक ने प्रामाणिक आंकड़ों के सहारे बताया है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान पूरे देश सफलता के साथ चल रहा है। प्रधानमंत्री ने 2015 को यह नारा हरियाणा के पानीपत शहर में दिया था, जो आज पूरे देश के कोने-कोने में पहुँच चुका है। अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि "आज हमें अपने ही घर में बेटी बचाने के लिए हाथ-पैर जोड़ने पड़ रहे हैं। समझाना पड़ रहा है। उसके लिए बजट से धन खर्च करना पड़ रहा है।" पुस्तक के हर अध्याय में लेखक ने पूरे मनोयोग के साथ प्रधानमंत्री के कार्यों को देखा-परखा है और अपना चिंतन भी प्रस्तुत किया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका के कारण पुस्तक की गरिमा कुछ और बढ़ गई है। 'अपनी बात' में लेखक ने गृह मंत्री अमित शाह की इन पंक्तियों को कोट किया है, जो नए भारत के स्वप्न को रेखांकित करता है कि "2014 के पहले देश के साठ करोड़ लोग सपना नहीं देख सकते थे। मोदी जी ने उनके जीवन उम्मीद जगाई है और उनमें महत्वाकांक्षाएँ पैदा की हैं। भारत जब आज़ादी का शताब्दी उत्सव मना रहा होगा, तो वह हर क्षेत्र में नम्बर-1 होगा।"

पुस्तक का अंतिम अध्याय 'उवाच' गागर में सागर की तरह है, जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय चर्चित हस्तियों के विचार समाहित हैं, जो मोदी जी के उत्कृष्ट कार्यों की प्रशंसा करते हैं। इनमें स्वरकोकिला लता मंगेशकर, सुधा मूर्ति, आनन्द महिंद्रा, पीवी सिंधु, अनुपम खेर, नन्दन नीलेकणि आदि उल्लेखनीय हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि पिछले नौ सालों में हुए महत्वपूर्ण कार्यों और प्रधानमंत्री के विज़न को समझने यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विभिन्न अध्यायों में विषय के अनुरूप चित्रों ने तथा आर्ट पेपर की उत्कृष्ट छपाई ने पुस्तक को नयनाभिराम भी बना दिया है। बधाई।

पुस्तक: अमृतकाल में भारत

लेखक: प्रो. संजय द्विवेदी

पृष्ठ: 196

मूल्य: 599 रुपये

प्रकाशक: यश पब्लिकेशंस, 4754/23, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

- गिरीश पंकज

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार हैं।)

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