किताब का छपना और लोकार्पण (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 15, 2023

यह दुर्घटना एक दो बरस पहले डिजिटली आयोजित पुस्तक मेले के बाद हमारे दिमाग के मंच पर हुई। तीन शुभचिंतक गलत मुहर्त में एक साथ हमें मिले कहने लगे, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, टिप्पणियां सब इकठ्ठी कर एक किताब छपवालो फिर हम पार्टी करेंगे। हम सोचते थे, हम जैसे लेखक कभी नाम को भी पुस्तक मेले में नहीं जा पाए, किताब छप गई तो शायद उस मेले में भी जा आएंगे। मनपसंद प्रसिद्ध लेखक और लेखिकाओं के साथ सेल्फी लेंगे। हो सकता है कोई बड़ा हाथ, किताब का लोकार्पण भी कर दे। बताते हैं वहां अभी भी सिर्फ एक किलो बर्फी में काम हो जाता है।

किताबें और किताबें छपने के मौसम में, अकादमी के एक पुराने घिसे पिटे सचिव ने भी हमारी इच्छाओं में ऑक्सीजन भरी। मीडिया युग में अनाम लेखक भी नुमांया होना चाहता है। अवसर है तो लाभ उठाना चाहिए। क्या पता कल फेसबुक पर चेहरा दिखाना भी मुफ्त न रहे। कई दिशाओं से किताब छपने, लोकार्पण, फोटो खबर छपने और नाम होने की बात सुनकर दिमाग में किताब उगने लगी। बधाईयाँ, शुभ कामनाएं, फोटोज़, अखबार व न्यूज़ चैनल अच्छे लगने लगे। पुस्तक मेला का हिस्सा होने के स्वप्न आने लगे।

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किताब के प्रस्तावना लेखक, संभावित लोकार्पण समारोह के सुनिश्चित मुख्य अतिथि ने उचित मूल्य प्रकाशक से बात की तो हम धन्य हो गए। किताब छपी, अकादमी की खरीद योजना का विज्ञापन आया तो किताबें भिजवा दी। सोचा, ज़िंदगी की पहली किताब है, लोकार्पण समारोह भी करवा ही लें। पत्रकार मित्र ने सरकारी सर्किट हाउस में मुख्य अतिथि के ठहरने का इंतजाम किया लेकिन ऐन मौके पर राजनीतिक घुसपैठ के कारण होटल में रुकवाना पड़ा। विमोचन में पूरे परिवार की फोटो खिंची, खुश पत्नी बोली अच्छा किया नेता नहीं बुलाए नहीं तो हर कहीं वही और उनके चेले पसरे रहते। 

अकादमी द्वारा स्वीकृत किताबों की लिस्ट आई, तीन बार पढी अपना नाम नदारद था। जिनका नाम कभी छपा नहीं उनकी किताबें खरीदी जा रही थी। पूर्व सचिव बोले इस बार निज़ाम बदलने के कारण अपनी भी रह गई। शुभचिंतक बोले, पहले जुगाड़ क्यूं नहीं किया। किताब छपवाने और विमोचन समारोह का खर्च बार बार चुभने लगा। दिमाग में कई नाम आने लगे थे जो बाद में ज़रूर कहेंगे हमें क्यूं नहीं कहा। सब भुलाकर, सकारात्मक होकर सोचा अखबारों में समीक्षा तो छपवा लें। एक अखबार वाले बोले समीक्षा लिखवाकर भेज दीजिए लेकिन ध्यान रखें सिर्फ प्रशंसा न हो। कुछ को याद दिलाया तो जाकर समीक्षा छपी। सरकारी पत्रिका में भेजी, एक साल तक छपी नहीं। कई जगह तो किताब ही गुम हो गई।  

स्थानीय मित्र लेखकों ने नकली खुश होकर भी प्रशंसा नहीं की उलटे उनका भेजा फ्राई हो गया। पिछले चालीस साल की जान पहचान लेकिन चार शब्द नहीं थूके। कुछ शिकवा कर मांगते रहे, हमें भी चाहिए किताब। किताब लेते हुए किसी ने एक बार भी नहीं कहा यह लीजिए पैसे। जिन्हें डाक से भेजी उन्होंने पहुंचने की खबर तक न दी। क्या करते इतनी किताबों का, बांटनी पड़ी। पता था दो पेज पढेंगे। सब का पता चल गया कि कौन कितना लेखक हैं और कितना संजीदा पाठक। एक सज्जन बोले इसका प्रिंटिंग साल वाला पेज बदलवा दो, करवा देंगे।

कुछ किताबें अभी भी बची पड़ी हैं रोज़ सोचते हैं किस सही प्राप्तकर्ता को दें। पुस्तक मेले में जाने का ख़्वाब, ख़्वाब ही रह गया। जाने, खाने, ठहरने, संभावित संक्रमण, वापिस आने व अन्य खर्चे का अनुमान लगाकर देखा तो घर पर रहना बेहतर लगा। सुरक्षात्मक ज़िंदगी जीने का तरीका अपनाते हुए, अगली किताब छपवाने बारे, कल पत्नी से परामर्श किया तो बोली, खबरदार दोबारा ऐसा सोचा। बाज़ार जाकर पांच साथ सब्जियां ले आइए, आज रविवार है, मंडी लगी होगी सस्ती मिलेगी। 

- संतोष उत्सुक

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