काशी कथा: मैं काशी हूँ, शरणागत मेरे पास आते हैं, मुक्तिदात्री जो हूँ! (पुस्तक समीक्षा)

By कमलेश पांडे | Jul 09, 2022

भारत सरकार के भूतपूर्व वरिष्ठ अधिकारी व बनारस वासी त्रिलोकनाथ पांडेय जी द्वारा रचित "काशी कथा", प्रलेक प्रकाशन, मुंबई आध्यात्मिक साहित्य-सृजन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। 249 रुपये मूल्य की 180 पृष्ठ और दस अध्याय वाली इस पुस्तक में लेखक ने भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी काशी नगरी यानी आधुनिक वाराणसी से जुड़े आध्यात्मिक व्यक्तित्वों की कहानियों को बखूबी चित्रित करने की एक रूचिकर पहल की है, जो सार्थक प्रतीत होता है। 


इस पुस्तक में कुल नौ धार्मिक, सामाजिक व साहित्यिक शख्सियतों की जीवन कथा का इतना सरल, सहज, सुंदर व सजीव चित्रण किया गया है कि पाठक उस कालखंड में विचरने लगते हैं। इसलिए इसे बार बार पढ़ने का दिल हर किसी सुधी पाठक का करेगा। वैसे भी शिव नगरी काशी के बारे में जानने-बुझने-देखने-समझने की जिज्ञासा हर किसी को होती है। देश ही नहीं, विदेशों में भी! कुल मिलाकर यह पुस्तक ज्ञान-विज्ञान और अवचेतना को सरल शब्दों में प्रकट करते हुए जात-पात की श्रेष्ठता का खंडन करती है और सदाचार एवं ईश्वर भक्ति समेत वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति को प्रोत्साहित करती है, जिसके पीछे लेखक की दिव्य दृष्टि अनुकरणीय है, वंदनीय है।

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इस पुस्तक में शिव-पार्वती संवाद आधारित विज्ञान भैरव तंत्र नामक अद्भुत आध्यात्मिक ग्रंथ की चर्चा की गई है जो अधिकांश हिन्दू वांग्मय का सार है। हिमाचल प्रदेश की एक पहाड़ी लोकगीत व्यष्टि से समष्टि तक सबकुछ स्पष्ट कर देती है- 

 

"मेरे प्रियतम, मेरे प्राणाधार 

हम तुम मिलकर बनते पूर्णाकार 

मेरे प्रियतम, मेरे प्राणाधार 

हमसे ही जीवंत है यह संसार।"


वहीं, इस पुस्तक में अघोर सम्प्रदाय को सरल भाषा में समझाया गया है, जिससे इसके प्रति समाज में फैली भ्रांति दूर होगी। इसमें सामाजिक कुरीतियों और कर्मकांड पर भी बातों ही बातों में करारा प्रहार किया गया है। 


सच कहा जाए तो लेखक ने काशी-कथा के बहाने ही उन शाश्वत मूल्यों और उसके पथ-प्रदर्शकों के जीवन के तार को कहानी के माध्यम से इस कदर झंकृत कर दिया है कि धर्मनिरपेक्षता के भाव प्रवाह में किनारे पड़ चुकी सनातन चेतना एक बार फिर से मुख्यधारा में आने को उद्यत हो जाएगी, जिसमें भारतवर्ष ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जगत का सर्वकालिक हित निहित है।


इस पुस्तक को पढ़ने से महसूस होता है कि काशी को इस बात का स्वाभिमान है कि "मैं काशी हूं। मेरे पास सब आते हैं। कोई मेरी गोद में जन्म लेता है, तो कोई बाहर से दौड़ा आता है मेरी गोद में बैठ जाने के लिए। कई मेरे पास ऐसे आते हैं जैसे खाली लिफाफा- निष्प्राण शरीर- आग के हवाले होने के लिए। मैं उन्हें भी स्वीकारती हूं। यह सब मेरे जो हैं।"

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इस पुस्तक की संवाद शैली गजब की है। लेखक, पात्र और जगह विशेष के संदर्भ में कब कौन, क्या और कैसे कह रहा है, आप अवश्य महसूस करेंगे। बकौल काशी, "मैं धन्य हो उठी जब शिव कैलाश से आकर मेरी गोद में बैठ गए। यह मेरा परम सौभाग्य रहा कि शिव-पार्वती ने मुझे वह दिया, जो आज तक कभी किसी को ना मिला। पवित्रता की जैसी मुहर शिव-पार्वती ने मुझ पर लगाई, भला और किसी नगरी को नसीब हुई।"


वह आगे कहती है कि "मैं धन्य हो उठी जब मेरी गोद में पार्श्वनाथ जन्मा, जिसने मानव इतिहास में वैचारिक क्रांति की एक बड़ी लकीर खींच दी। वहीं, सिद्धार्थ को जब समझ आई तो अपने साथियों संग उसे साझा करने भागते हुए वह आखिर मेरी ही गोद में आया।" वह पुनः कहती है कि "दक्षिण से एक बड़ा सबूत मेरे पास आया- बड़ा विद्वान, बड़ा तपस्वी, बड़ा ऊर्जावान। शंकर नाम था उसका। अपने ज्ञान में डूबा रहता था। अपने ज्ञान से सबको परास्त करता चलता था। आखिर उसको समझ तब आई जब हमरे सबसे लहुरे लड़िकवा ने उसको अच्छी तरह समझाया।"


वह फिर कहती है कि "मेरी गोद में मेरा सबसे नटखट बेटा जन्मा कबीर- बड़ा बंगड़, सबसे लड़ता फिरे, सबसे उलझता फिरे। आखिर वक्त में सब भागे हुए मेरे पास आते हैं, लेकिन वह रूठ कर मुझसे दूर चला गया। मैं उसे समझाती रह गई, लेकिन वह न माना। पर वह है तो मेरा ही। वह मुझे छोड़ कर जा सकता है। मैं उसे कैसे छोड़ सकती हूं! मैं मां हूं न!" उसे इस बात का भी गौरव है कि "रैदास मेरी आंचल का सबसे चमकता सितारा था। अहा, कैसा सुशील भगवदभक्त था वह। वहीं, मेरा एक सपूत तुलसी भी था जो मेरी गोद में राम-गुन-गान करते-करते  गोस्वामी तुलसीदास बन गया। उसके लिखे को सबने सराहा।"


वह फिर कहती है कि "इन सबके गुरु- रामानंद- की तो बात ही मैं क्या कहूं! भक्ति-आंदोलन और समाज सुधार की तो उसने ऐसी आंधी लाई कि युगों से जमाई बहुत सारी रूढ़ियां उखड़-पुखड़ गईं। वहीं, अपने एक और सपूत- कीनाराम- का नाम न लूं तो उसके साथ नाइंसाफी होगी। उसके बारे में जानना बड़ा रोचक है।" अंततः, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि "मेरी गोद में एक से बढ़कर एक रतन पैदा हुए। मैं किस-किस का नाम लूं। एक से बढ़कर एक हीरे बाहर से आकर मेरी गोद में गिरे। मैं कितनी गिनती करूं!! मैं उन सब के बारे में क्या बताऊं!!! मेरे लिए तो सब अपने ही हैं। उनमें से कुछ आध्यात्मिक प्रभाव वालों की कहानी कहने को जब मुझसे कहा गया तो मैं साफ मुकर गई। सब अपने से खुद कहें या उनके संगी-साथी कहें।"


सच कहूं तो काशी के कहने के बाद किसी और के कहने का कोई तातपर्य नहीं रह जाता। लेखक खुद कहते हैं कि काशी के निर्देशानुसार मैंने सबकी सुनी और अपनी कलम से उसको शब्दों में ढाल दिया। अपनी ओर से न कुछ जोड़ा, न कुछ घटाया। बस, कलमबंद किया। अंत में लेखक ने खुद ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह साहित्यिक कृति है। इसकी कहानियों का सृजन कल्पना से किया गया है, यद्यपि प्रयास किया गया है कि ऐतिहासिक तथ्यों और जनश्रुतियों की मूल भावना को अक्षुण्ण रखा जाए। साथ ही, सभी धर्मों के प्रति समादर एवं सदाशयता रखते हुए आध्यात्मिक मूल्यों का मंडन करने के लिए पाखंडों का खंडन किया गया है। 


स्पष्ट है कि लेखक का यह प्रयास सराहनीय है, जो अन्य धर्मावलंबियों को भी इस पुस्तक को पढ़ने को प्रेरित करेगा, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। 


पुस्तक-समीक्षा

- कमलेश पांडेय, 

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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