Boong Movie Review : एक मासूम दिल की जिद और मणिपुर की अनकही दास्तां का खूबसूरत संगम

By रेनू तिवारी | Mar 07, 2026

अक्सर जब हम मणिपुर का नाम सुनते हैं, तो समाचारों की सुर्खियां और राजनीतिक उथल-पुथल जेहन में आती है। लेकिन सिनेमा की जादुई दुनिया कभी-कभी हमें उस मिट्टी की गहरी मानवीय कहानियों से रूबरू कराती है, जो खबरों के शोर में कहीं दब जाती हैं। बाफ्टा (BAFTA) विजेता फिल्म 'बूंग' ऐसी ही एक अनमोल कृति है। नवागत निर्देशिका लक्ष्मीप्रिया देवी की यह फिल्म किसी बड़े राजनीतिक भाषण की तरह नहीं, बल्कि एक 9 साल के बच्चे की मासूमियत के जरिए मणिपुर की अनकही दास्तां बयां करती है। यह फिल्म साबित करती है कि कभी-कभी दुनिया के सबसे कठिन सच एक बच्चे की जिद के पीछे छिपे होते हैं।


साधारण कहानी में असाधारण भावनाएं

'बूंग' को जो बात सबसे खास बनाती है, वह है इसकी सादगी। फिल्म में कोई भव्य तमाशा नहीं है, न ही कोई ऐसा भारी-भरकम बैकग्राउंड स्कोर है जो आपको यह बताए कि कब रोना है। इसके बजाय, फिल्म रोजमर्रा के छोटे-छोटे क्षणों के माध्यम से आपके दिल में उतर जाती है। एक शरारती स्कूली लड़का, उसकी चिंतित माँ और एक ऐसी दोस्ती जो वास्तविकता के करीब लगती हैयही इस फिल्म की जान है।

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माँ-बेटे का अटूट विश्वास

बूंग के पिता को लापता हुए कई साल बीत चुके हैं। फोन कॉल और वॉयस मैसेज का कोई जवाब नहीं आता, फिर भी बूंग आश्वस्त है कि वे जीवित हैं। वह अपनी माँ, मंदाकिनी (बाला हिजाम) को उनके लौटने का 'उपहार' देना चाहता है। पूरा गाँव पिता की मृत्यु को स्वीकार कर चुका है, लेकिन मंदाकिनी का इनकार ही बूंग के संकल्प को हवा देता है। अपने सबसे अच्छे दोस्त राजू (अंगोम सनमतम) के साथ, बूंग मोरे जैसे सीमावर्ती शहर की जटिलताओं को पार करते हुए म्यांमार तक पहुँच जाता है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और मासूमियत का टकराव

ऊपरी तौर पर यह एक बच्चे के एडवेंचर की कहानी लगती है, लेकिन गहराई में यह फिल्म मणिपुर की तनावपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को छूती है। सीमाएं, पहचान और अपनेपन का मुद्दा यहाँ शोर मचाकर नहीं, बल्कि अहसास के जरिए दिखाया गया है। निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी ने एक बच्चे के नजरिए से जातीय तनाव और अलगाववादी संघर्षों को दैनिक जीवन का हिस्सा दिखाया है।

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हल्के-फुल्के पल और सामाजिक कटाक्ष

फिल्म में बूंग की शरारतें दर्शकों को गुदगुदाती हैं। अपने स्कूल का नाम बदलकर 'होमो बॉयज स्कूल' करना, सुबह की प्रार्थना में मडोना का गाना गाना या किसी बुली (Bully) को "सेकंड हैंड विदेशी" कहना—ये सब उसकी बढ़ती समझ और परिवेश को दर्शाते हैं। फिल्म बिना उपदेश दिए पितृसत्ता और पूर्वाग्रहों पर शांत प्रहार करती है।


इनसाइडर-आउटसाइडर: एक कड़वी हकीकत

'बूंग' फिल्म 'बाहरी और भीतरी' की बहस को भी बखूबी छूती है। राजू के पिता सुधीर (विक्रम कोचर) का परिवार सदियों से वहां रह रहा है, लेकिन मारवाड़ी विरासत के कारण उन्हें आज भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह ट्रैक भारत के अन्य हिस्सों में उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव की याद दिलाता है। आंकड़ों की बात करें तो, भारत के महानगरों में उत्तर-पूर्व की महिलाओं और छात्रों के खिलाफ नस्लीय टिप्पणी और भेदभाव के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं (जैसे हाल ही में दिल्ली में अरुणाचल और मणिपुर की महिलाओं के साथ हुआ)। फिल्म दिखाती है कि भेदभाव की यह बीमारी हर जगह मौजूद है।

दोस्ती और अभिनय का जादू

फिल्म का पूरा बोझ बूंग और राजू की दोस्ती पर टिका है। दोनों ही बच्चे किसी न किसी नुकसान से जूझ रहे हैं—बूंग के पास पिता नहीं है, तो राजू ने अपनी माँ को खो दिया है। गुगुन किपजेन ने 'बूंग' के किरदार में मासूमियत और चंचलता का बेहतरीन मिश्रण पेश किया है। वहीं, बाला हिजाम ने एक माँ के रूप में मौन लेकिन प्रभावशाली अभिनय किया है। उनकी आंखों में छिपी त्रासदी फिल्म को गंभीरता प्रदान करती है।

निष्कर्ष: एक छोटी लेकिन शक्तिशाली आवाज

ऐसे समय में जब मुख्यधारा का सिनेमा आत्मा से ज्यादा भव्यता (Scale) को प्राथमिकता देता है, 'बूंग' याद दिलाती है कि सबसे शक्तिशाली कहानियाँ अक्सर सबसे छोटी आवाजों से आती हैं। यह फिल्म एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो विश्वास करना बंद नहीं करता। जब फिल्म खत्म होती है, तो आप खुद को उस छोटे से लड़के के लिए दुआ करते हुए पाते हैं।

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