विनायक दामोदर सावरकर की वीरता से ब्रिटिश हुकूमत भी खाती थी खौफ

By अनन्या मिश्रा | Feb 25, 2023

इतिहास में भले ही दामोदर दास सावरकर यानी वीडी सावरकर का नाम विवादों में शामिल रहा है। लेकिन वह एक क्रांतिकारी नेता, लेखक, चिंतक, समाज सुधारक, स्वतंत्रता आंदोलन सबसे आगे वाली पंक्ति के सेनानी होने के साथ ही वह प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। सावरकर कई लोगों के लिए विलेन तो कई लोगों के लिए हीरो हैं। बता दें कि वीर सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर है। वहीं उनकी वीरता के कारण लोग उन्हें वीर कहकर बुलाने लगे। जिसके बाद से उन्हें वीर सावरकर कहा जाने लगा। आज ही दिन यानि की 26 फरवरी को वीर सावरकर का निधन हुआ था।

हिंदुत्ववादी सावरकर का जन्म एक ब्राह्मण हिंदू परिवार में 28 मई 1883 भागपुर, नासिक में हुआ था। वीर सावरकर के पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर और मां का नाम यशोदा सावरकर था। बहुत कम उम्र में सावरकर के सिर से माता-पिता का साया उठ गया था। उनके भाई-बहन गणेश, मैनाबाई और नारायण थे। कहा जाता है कि सावरकर अपने भाई गणेश से बेहद प्रभावित थे। गणेश ने वीर सावरकर के जीवन में अहम भूमिका निभाई।

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शिक्षा

वीर सावरकर ने फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे, महाराष्ट्र से बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली। इसके बाद वह लंदन के द ऑनरेबल सोसाइटी ऑफ़ ग्रेज़ इन में बैरिस्टर के रूप में कार्यरत थे। इस दौरान उन्हें इंगलैंड में पढ़ाई करने ऑफर मिला। इसके लिए सावरकर को स्कॉलरशिप भी दी गई। वीर सावरकर को इंग्लैंड भेजने और पढ़ाई को आगे बढ़ाने में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने मदद की। वहां पर वीर सावरकर ने 'ग्रेज इन लॉ कॉलेज' में एडमिशन लिया। वीर सावरकर लंदन में अपने साथी भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया करते थे। 

आजादी में हिस्सेदारी

लंदन में पढ़ाई के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए एक संगठन 'फ्री इंडिया सोसाइटी' बनाया। इसके अलावा 'मित्र मेला' के नाम से एक संगठन बनाया। इस संगठन के द्वारा उन्होंने लोगों को भारत की 'पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता' के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित किया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने वीर सावरकर की ग्रेजुएशन की डिग्री वापस ले ली। 1906 में जब सावरकर बैरिस्टर बनने के लिए लंदन गए तो उन्होंने भारतीय छात्रों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हथियारों के इस्तेमाल का समर्थन किया।

जेल यात्रा

सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण वीर सावरकर को मार्च 1910 में गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही मुकदमे के लिए भारत वापस भेज दिया गया। लेकिन जब वीर सावरकर को ले जाने वाला जहाज फ्रांस के मार्सिले पहुंचा तो सावरकर वहां से भाग निकले। लेकिन उन्हें फ्रांसीसी पुलिस ने दोबारा हिरासत में ले लिया। 24 दिसंबर 1910 में सावरकर को अंडमान में जेल की सजा सुनाई गई थी। बता दें कि वीर सावरकर ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। जिसके चलते महज 28 साल की उम्र में उन्हें 2-2 आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जिसके बाद उन्हें अंडमान की जेल में कैदी बनाया गया था।

मृत्यु

आमतौर पर माना जाता है कि काला पानी की सजा ने वीर सावरकर के स्वास्थ्य पर बहुत गहरा असर डाला था। उन्होंने अपने लिए इच्छामृत्यु चुनी थी। आजीवन कारावास की सजा के दौरान सावरकर ने 'आत्महत्या या आत्मसमर्पण' नामक एक लेख लिखा था। इस लेख में उन्होंने स्पष्ट तौर पर दोनों के बीच का अंतर बताया था। सावरकर के अनुसार, जब जीवन का मिशन पूरा हो जाता है और शरीर आपका साथ छोड़ने लगता है तब जीवन का अंत करना बलिदान कहा जाना चाहिए। वहीं निराश इंसान द्वारा जीवन समाप्त करने को आत्महत्या। कहा जाता है कि सावरकर ने 1 महीने पहले से खाना-पानी और दवाइयां लेना छोड़ दिया था। उपवास करते हुए 26 फरवरी 1966 को वीर सावरकर का निधन हो गया। इसलिए कहा जाता है कि सावरकर ने अपने लिए इच्छामृत्यु चुनी थी।

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