हलवे जैसा बजट (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jul 17, 2024

बजटजी आने वाले हैं और उम्मीदों ने नाचना शुरू कर दिया है। उच्च वर्ग को कुछ सोचने या करने की ज़रूरत नहीं उसका बढ़िया ख्याल तो सरकारजी खुद ही रखती है, रखना पडता है इसलिए रखेगी। मध्यम वर्ग ने बैंक से क़र्ज़ लेकर मकान खरीद रखा है जिसे घर बनाने में पत्नी भी रात दिन जुटी हुई है। किश्तों पर ली हुई कार गली में खडी है। जब भी उसे चलाने का मौक़ा मिलता है कई बार लगता है इसकी ज़रूरत नहीं थी। पड़ोसियों की देखा देखी में ले तो ली लेकिन इसकी और बीमा की मासिक किश्त ही काफी है हर महीने गौर से देखने के लिए। 

इसे भी पढ़ें: शादियों के जलवे (व्यंग्य)

उम्मीद कहती है शायद इस बार बजट में आयकर में छूट मिल जाए। मकान के क़र्ज़ पर ब्याज कम लगे। आम इंसान बार बार भूलना चाहता है कि हर महीने उसने कितना ब्याज देना है। लेकिन बजट के दिन आते हैं तो उसे लगता है कि वह बीच में पिस रहा है। उस पर आयकर कम होना चाहिए क्यूंकि इसी देश में शासकों की आय पर टैक्स सरकार देती है। मध्यम वर्ग तो जीएसटी भी दे रहा है और आयकर भी। उसके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और बीमा सब महंगा है। पेंशन भोगी भी आयकर झेल रहे हैं। 

बजट का मदारी सांस्कृतिक हलवा खाकर आएगा, डुगडुगी बजाएगा, राजनीतिक घोषणाएं कर झूठी मुस्कुराहटें पकड़ा कर चला जाएगा। बजट की योजनाओं में अंकों की जादूगरी समझते समझते, अगला वार्षिक हलवा भी बांट दिया जाएगा। एक बार मिली ज़िंदगी में सपने कहां खत्म होते हैं। सपने हैं तो उन्हें पूरा करने के लिए बाज़ार रात दिन जवां है और जवान रहने के लिए बजट की सुन्दरी का नृत्य देखने को बेताब है। 

बजट हलवे जैसा होता है जिसमें पहले कभी पता नहीं चलता कि बादाम, नारियल और किशमिश वगैरा कितनी हैं। यह तो हलवा खाते हुए पता चलता है कि मुंह की किस्मत में क्या आया।    

- संतोष उत्सुक

प्रमुख खबरें

उत्तराखंड में BJP ने शुरू की चुनावी तैयारी, 2027 के लिए विस्तारक योजना के संयोजकों की सूची जारी

Shiv Sena UBT नेता प्रदीप पूर्णेकर हत्याकांड के दो आरोपी Prayagraj से ठाणे लाए गए

संगठन की मजबूती के दम पर तय हो सीटों का बंटवारा: Anupriya Patel

Siliguri में हिंदू दुकानों से Biryani और पूजा सामग्री खरीदने की अपील वाले पोस्टरों पर विवाद