कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च से सुलगते सवाल और राजनीतिक निहितार्थ

By कमलेश पांडे | Jul 21, 2026

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का "संसद चलो" आह्वान केवल एक विरोध मार्च नहीं, बल्कि केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की एक राजनीतिक रणनीति है। खासकर जिस तरह से इस आंदोलन को छात्र आंदोलन का स्वरूप दिलवाया जा चुका है, वह डीप स्टेट के इशारे पर बनी विपक्ष की शातिर सरकार घेरो रणनीति का कमाल भी करार दिया जा रहा है। देखा जाए तो संसद के मानसून सत्र के दौरान गत 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने के दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे और कूच किया, वह बिल्कुल संगठित राजनीतिक आंदोलन के तर्ज पर हुआ। 

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यदि संसद मार्च के घटनाक्रमों पर संतुलित नजर डालें तो यही प्रतीत होता है कि जब बड़ी संख्या में सीजेपी (CJP) समर्थक "संसद चलो" मार्च के लिए जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़े, तो भले ही उनकी मुख्य मांगें शिक्षा सुधार, परीक्षा-पत्र लीक और जवाबदेही था, लेकिन इरादे तोड़फोड़ वाले और खतरनाक थे, अन्यथा पुलिस को बल प्रयोग नहीं करना पड़ता। चूंकि संसद के मानसून सत्र के दौरान माननीयों की सुरक्षा के दृष्टिगत दिल्ली पुलिस ने व्यापक बैरिकेडिंग की थी, इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को रोका, हिरासत में लिया तथा कुछ स्थानों पर आंदोलनकारियों द्वारा उपद्रव करने के बाद आंसू गैस और बल प्रयोग की घटनाएं सामने आईं। इससे अफरातफरी मच गई।

देखा जाए तो इस आंदोलन की प्रमुख मांगों में नीट (NEET) पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं पर कार्रवाई, बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही, कुछ नेताओं द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ संवाद आदि हैं, लेकिन जो उत्पात दिखाई-सुनाई दिया, वह विपक्षी संस्कार नहीं तो क्या है? फिर भी, केंद्र सरकार ने आंदोलन के प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल भी की, जो टकराव के बीच संवाद की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर CJP प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की और मांगपत्र ग्रहण किया। बावजूद इसके आंदोलनकारी अपनी मांगों पर कायम हैं। 

सवाल है कि संसद मार्च के क्रम में जो कुछ गड़बड़ हुआ, क्या वह लोकतांत्रिक है, सही था या गलत? तो जवाब होगा कि युवाओं का शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा की निष्पक्षता जैसे मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठाना लोकतंत्र का वैध हिस्सा है। वहीं, सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से बातचीत शुरू करना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप कदम है। फिर भी संसद मार्च के दौरान  आंदोलनकारियों की ओर से कुछ कुछ गलत हुआ जो अनुचित लगा। यदि प्रदर्शनकारियों ने निषिद्ध क्षेत्र में जबरन प्रवेश करने या बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, तो वह कानून-व्यवस्था की दृष्टि से उचित नहीं माना जाएगा। 

वहीं, यदि पुलिस ने आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अनावश्यक कार्रवाई हुई, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हालांकि, इस पर अलग-अलग पक्षों के अपने अपने दावे हैं और सभी तथ्यों के गोलमोल जवाब ही मिले हैं, जिनपर एतबार करना मुश्किल है क्योंकि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, जिसका अंतिम सत्यापन अभी होना बाकी है, कई अनकही कहानियां गढ़ रहे हैं। इससे सरकार सांसत में है और विपक्ष तरह-तरह के आरोप लगाकर सिस्टम की मुश्किलें बढ़ा रहा है। हालांकि इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतांत्रिक समाधान का सर्वोत्तम रास्ता संवाद और कानून के दायरे में रहकर समस्या का समाधान है।

भले ही किसी भी लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अपनी मांगें रखना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन इस संसद मार्च के क्रम में देश की राजधानी नई दिल्ली के हृदय स्थल पर, जिस प्रकार की हिंसा, तोड़फोड़, सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या सुरक्षा बलों से टकराव की जो प्रवृति दिखाई दी, वह विपक्षी दलों का परोक्ष कुचक्र नहीं तो क्या है? आखिर इस देशद्रोही प्रवृति को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता है। 

इसी प्रकार, यदि पुलिस बल का प्रयोग आवश्यकता से अधिक हुआ हो, तो उसकी भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। सवाल है कि क्या स्थानीय जिलाधिकारी और डीसीपी के पास छात्र समूह को काबू में रखने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी? और यदि थी तो फिर इतना सबकुछ कैसे हुआ? वहीं कोई पुलिस कर्मी कैसे पिट गया और घायल हुआ? आखिर किसी दुकानदार को तोड़-फोड़ का सामना क्यों और कैसे करना पड़ा? जनपथ बाजार की सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त क्यों नहीं किए गए थे। वहीं, अनियंत्रित युवा भीड़ क्यों जुटने दी गई और उनको काबू में रखने के लिए व्यापक बंदोबस्त क्यों नहीं किये गए थे?

# कॉकरोच जनता पार्टी के "संसद चलो" आह्वान के राजनीतिक मायने 

कॉकरोच जनता पार्टी के "संसद चलो" आह्वान के राजनीतिक मायने केवल एक विरोध मार्च तक सीमित नहीं हैं,  बल्कि यह भारतीय राजनीति में युवाओं के असंतोष, डिजिटल आंदोलन और पारंपरिक दलों के प्रति अविश्वास का प्रतीक बनकर उभरा है। हालांकि CJP स्वयं को व्यंग्यात्मक (satirical) आंदोलन बताता है, लेकिन इसके मुद्दे गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं। 

यही वजह है कि राजनीतिक दृष्टि से इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं:- पहला, संसद के मानसून सत्र के पहले दिन दबाव की राजनीति। दूसरा, युवाओं और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों के असंतोष को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास। तीसरा, विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का अवसर और चौथा, सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए आंदोलनकारियों से संवाद की चुनौती आदि। 

हालांकि, इसके प्रमुख राजनीतिक संकेत इस प्रकार हैं:

एक, युवा असंतोष का राजनीतिक रूपांतरण: बेरोज़गारी, परीक्षा-पत्र लीक, शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर नाराज़गी को संगठित करने का प्रयास दिखाई देता है। दो, डिजिटल से सड़क तक: सोशल मीडिया पर शुरू हुआ अभियान अब वास्तविक जन-प्रदर्शन में बदलता दिख रहा है, जो यह संकेत देता है कि ऑनलाइन असंतोष भी राजनीतिक दबाव का माध्यम बन सकता है। 

तीन, सरकार पर दबाव: संसद के मानसून सत्र के पहले दिन मार्च का समय चुनना सरकार और संसद का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति माना जा सकता है। सरकार और CJP प्रतिनिधियों के बीच बातचीत शुरू होने की खबर भी इसी दबाव का संकेत है।

चार, विपक्ष के लिए अवसर: यदि विपक्ष इस असंतोष को राजनीतिक समर्थन देता है, तो यह सरकार को घेरने का एक नया मुद्दा बन सकता है। वहीं यदि आंदोलन स्वतंत्र बना रहता है, तो यह पारंपरिक दलों से अलग एक नई राजनीतिक शैली का संकेत होगा।

पांच, प्रतीकों की राजनीति: "कॉकरोच" जैसे अपमानजनक शब्द को पहचान और प्रतिरोध के प्रतीक में बदलना राजनीतिक संचार की एक प्रभावी रणनीति है, जो विशेषकर युवाओं के बीच ध्यान आकर्षित करती है। छठा, CJP की कई मांगें और उसकी प्रस्तुति व्यंग्य एवं प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा हैं। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि यह एक स्थायी राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति बन जाएगी। दरअसल उसकी वास्तविक राजनीतिक क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वह सोशल मीडिया की लोकप्रियता को लंबे समय तक संगठित जनसमर्थन और ठोस राजनीतिक संगठन में बदल पाती है। 

निष्कर्षत: यही कहना उपयुक्त होगा कि लोकतंत्र में न तो हिंसक टकराव समाधान है और न ही वैध असंतोष को केवल बल पूर्वक दबाना। लिहाजा सबसे उचित रास्ता यही है कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे, कानून का सम्मान हो, और सरकार ठोस संवाद के माध्यम से शिक्षा सुधार तथा परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दों का विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करे। अन्यथा छात्र आंदोलन यदि राष्ट्रीय स्वरूप अख्तियार कर लेगा तो सनातनी सत्ता को लेने के देने पड़ जाएंगे।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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