आया मौसम परीक्षा परिणामों का (व्यंग्य)

By पीयूष पांडे | Jul 13, 2020

महाकवि आनंद बक्षी साहब ने कई साल पहले एक गीत लिखा था। बोल थे-‘एक बरस में मौसम चार-मौसम चार, पांचवा मौसम प्यार का।‘ उन दिनों बोर्ड परीक्षा परिणामों को लोग दिल पर नहीं लेते थे, अन्यथा कविवर गीत में अवश्य छठे मौसम के रुप में परीक्षा परिणामों का उल्लेख करते।

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जो मां-बाप अपने जमाने में ‘सो कॉल्ड’ तुर्रम खां रहे हैं, वे तो बच्चे से 101 नंबर चाहते हैं। उम्मीद पर दुनिया कायम है वाले मुहावरे को हजारों बार पढ़ते पढ़ते ऐसे मां-बाप बच्चों से 100 में से 101 नंबर लाने की उम्मीद पालने में कतई गुरेज नहीं करते। जिस तरह भारतीय नेताओं से गरीब जनता बरसों से उम्मीद पाले बैठी है कि वो उनकी गरीबी दूर करेंगे, वैसे ही कई मां-बाप बच्चों से उम्मीद पालकर बैठ जाते हैं कि वो बोर्ड इम्तिहान टॉप करके मानेंगे। वो तो कानूनन 100 में से 101 नंबर देने की व्यवस्था नहीं है, वरना 100 नंबरों से भी असंतुष्ट कई मां-बाप स्कूल के बाहर धरना देते दिखते।

इस मौसम में छात्र भी कुछ परेशान रहते हैं। जिन्होंने पढ़ाई कर परीक्षा दी होती है, वो इस चिंता में दुबले हुए जाते हैं कि कहीं अपेक्षानुरुप अंक नहीं आए तो क्या होगा? जिन्होंने नकल भरोसे परीक्षा दी होती है, वे इसलिए परेशान रहते हैं कि कहीं जांचने वाले ने नकल ताड़ ली तो? चुनाव में खड़े कई निर्दलीय उम्मीदवारों की तरह कई छात्रों को भी मालूम होता है कि वो फेल होंगे। वे फेल होते ही घर से भागने की फुलप्रूफ योजना तैयार रखते हैं। कुछ चालाक विद्यार्थी गर्मी या बरसात के चक्कर में योजना स्थगित कर देते हैं अलबत्ता परिणाम आने के बाद मां-बाप की पिटाई के बाद कई बच्चों की घर से भागने की योजना स्थायी रुप से स्थगित भी हो जाती है।

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इस छठे मौसम के कई रंग हैं। हालांकि, इंटरनेट पर परिणाम आने के बाद वो रोमांच अब नहीं है, जो पहले हुआ करता था। उस जमाने में सामूहिक रुप से जश्न और रुदन हुआ करता था। मुहल्ले भर में लड्डू बंटा करते थे। आजकल, नतीजों के मौसम का उत्साह भी ब्रेकिंग न्यूज की पट्टियों के साथ चंद सेकेंड में गुजर जाता है।

- पीयूष पांडे

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