BRICS 2026: क्या विस्तार के बाद Global Economy की दिशा बदल पाएगा भारत? 11 देशों के Leaders पर टिकी नजरें

By अभिनय आकाश | Sep 01, 2026

12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली का भारत मंडपम 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। वर्ष 2006 में बने इस समूह के 20 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित यह बैठक बेहद अहम है। दुनिया की 45 प्रतिशत से ज्यादा आबादी और करीब 30 फीसदी वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच आज एक ताकतवर गुट बन चुका है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वैश्विक नेताओं की मेजबानी करेंगे, तो भारत के सामने कई कूटनीतिक चुनौतियां होंगी। बदलते वैश्विक व्यापार नियमों और पश्चिम एशिया के संकट के बीच नई दिल्ली के लिए यह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनने और ब्रिक्स को पश्चिमी-विरोधी धड़े में तब्दील होने से बचाने का एक बड़ा इम्तिहान होगा।

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गैर-पश्चिमी, पश्चिमी-विरोधी नहीं: भारत की रणनीतिक पहचान

जब भारतीय राजनयिक शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र को अंतिम रूप दे रहे हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक है। 11 सदस्यों वाले इस बड़े समूह में इस बात को लेकर बुनियादी मतभेद हैं कि ब्रिक्स को कैसा होना चाहिए। मॉस्को और बीजिंग ब्रिक्स को पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने, G7 के प्रभुत्व का मुकाबला करने और पश्चिमी प्रभाव से मुक्त एक वैकल्पिक आर्थिक ढांचा तैयार करने के लिए एक मुख्य भू-राजनीतिक साधन के रूप में देखते हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि इस समूह में पश्चिमी प्रतिबंधों और सुरक्षा गठबंधनों का मुकाबला करने की क्षमता है। इसके विपरीत, भारत इस बात को नहीं मानता कि ब्रिक्स को पश्चिमी-विरोधी टकराव वाले गठबंधन के तौर पर काम करना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बार-बार नई दिल्ली का रुख स्पष्ट किया है: ब्रिक्स गैर-पश्चिमी है, पश्चिमी-विरोधी नहीं। भारत का रणनीतिक हित इस बात में है कि वह ब्रिक्स (BRICS) का इस्तेमाल मौजूदा ग्लोबल संस्थाओं जैसे यूनाइटेड नेशंस, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक — में सुधार लाने के लिए करे, न कि उन्हें खत्म करके ध्रुवीकृत और कोल्ड-वॉर जैसे गुटों में बंटी दुनिया बनाए। संतुलन बनाने की इस कोशिश में भारत की एक खास स्थिति है: वह अकेला ऐसा देश है जो ब्रिक्स और क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (Quad) जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं दोनों का सक्रिय सदस्य है। एक तरफ भारत इंडो-पैसिफिक समुद्री सुरक्षा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डिफेंस सप्लाई चेन के मामलों में वॉशिंगटन और यूरोप की राजधानियों के साथ मिलकर काम करता है, तो दूसरी तरफ वह नई दिल्ली में रूस, चीन और ईरान के साथ भी एक ही मेज पर बैठता है।

बड़ी ताकतों के बीच संतुलन: बीजिंग, मॉस्को और वॉशिंगटन

इस समिट की मेज़बानी करने के लिए नई दिल्ली को दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ जटिल द्विपक्षीय मतभेदों को संभालना होगा और साथ ही बहुपक्षीय नतीजों की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।

चीन के साथ समीकरण

सैन्य बातचीत के बाद 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (LAC) पर धीरे-धीरे सेना पीछे हटने के बावजूद, भारत और चीन के बीच बुनियादी तनाव अभी भी बना हुआ है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सीमा सुरक्षा और दक्षिण एशिया में बीजिंग का बढ़ता प्रभाव, दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। ब्रिक्स (BRICS) के संदर्भ में, भारत इस बात को लेकर सतर्क है कि चीन इस बड़े हुए समूह का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय पहलों को आगे बढ़ाने या ब्रिक्स को बीजिंग की विदेश नीति के लक्ष्यों का समर्थन करने वाला मंच बनाने के लिए न करे।

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