Vikram Batra Birth Anniversary: कारगिल युद्ध के 'शेरशाह' थे कैप्टन विक्रम बत्रा, जानिए क्यों कहा था 'दिल मांगे मोर'

By अनन्या मिश्रा | Sep 09, 2025

आज ही के दिन यानी की 09 सितंबर को कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। साल 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान को करारी शिकस्त देने वाले विक्रम बत्रा ने अपने नेतृत्व और बहादुरी से भारतीय सेना में अपनी अलग पहचान बनाई थी। जोश और जुनून के साथ देश की रक्षा के लिए विक्रम बत्रा ने अपनी जान की परवाह नहीं की। कारगिल युद्ध के नायक रहे विक्रम बत्रा आज भी हर देशवासी के दिल में जिंदा हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विक्रम बत्रा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...


जन्म और परिवार

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास स्थित घुग्गर गांव में एक पंजाबी-खत्री परिवार में 09 सितंबर 1974 को विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जी.एल. बत्रा था, जोकि स्कूल प्रिंसिपल थे और मां जय कलम बत्रा भी शिक्षिका थीं। ऐसे में देशभक्ति और अनुशासन का पाठ विक्रम को बचपन से ही मिला था।


करियर

साल 1996 में विक्रम बत्रा ने इंडियन मिलिट्री अकादमी, देहरादून की मानेकशॉ बटालियन ट्रेनिंग ली। फिर 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में कमीशन मिला। सबसे पहले उनकी पोस्टिंग सोपोर, जम्मू-कश्मीर राइफल्स में हुई थी। इसके बाद उन्होंने लेफ्टिनेंट से कैप्टन तक का सफर तय किया। विक्रम बत्रा के पास विनम्रता, तेज बुद्धि और नेतृत्व करने की असाधारण क्षमता थी। युद्ध के मैदान में विक्रम के यह गुण उनके सबसे बड़े हथियार थे।


कारगिल युद्ध

साल 1999 में जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तो लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को टोलोलिंग सेक्टर में तैनात किया गया। इस दौरान उनका पहला लक्ष्म पॉइंट 5140 था, जोकि एक मुश्किल लेकिन काफी अहम चोटी थी। विक्रम बत्रा ने दुश्मनों को मात देकर जब यह लक्ष्य हासिल किया गया, तो रेडियो पर एक ऐतिहासिक संदेश दिया। इस संदेश में विक्रम बत्रा ने कहा 'यह दिल मांगे मोर' इस नारे ने हर देशवासी को देशभक्ति की भावना से भर दिया। इस विजय के बाद विक्रम बत्रा को प्रमोट करके कैप्टन बनाया गया।


विक्रम बत्रा की शहादत

विक्रम बत्रा के सामने अगला बड़ा लक्ष्य पॉइंट 4875 था। जिसको अब बत्रा टॉप कहा जाता है। यह सबसे चुनौतीपूर्ण ऑपरेशनों में से एक था। यहां तक पहुंचने के लिए भारतीय सेना को दुश्मन की बंकर पोजीशन को तोड़ना था। फिर 400 मीटर की सीधी चढ़ाई करनी थी और इस दौरान गोलियों और तोपों से लड़ना था। करगिल युद्ध के दौरान आमने-सामने की मुठभेड़ में कैप्टन बत्रा ने 5 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था।

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कैप्टन बत्रा पहले से घायल थे, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हैंड ग्रेनेड से बंकर साफ किया और आखिरी पल तक जवानों का नेतृ्त्व किया। लेकिन 07 जुलाई 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।


सम्मान

कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया। वहीं विक्रम बत्रा की बहादुरी के कारण आज पॉइंट 4875 को उन्हीं के नाम पर बत्रा टॉप से जाना जाता है। साल 2021 में आई फिल्म 'शेरशाह' ने विक्रम बत्रा के जीवन और उनकी वीरगाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।

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