By अनन्या मिश्रा | Apr 23, 2026
उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और समानता के लिए यूजीसी ने एक अहम कदम उठाया है। साल 2026 के लिए यूजीसी ने एक नए विनियम जारी किए हैं। जिसका उद्देश्य कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जाति आधारित भेदभाव को रोकना है। देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर यह नियम समान रूप से लागू होंगे। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी स्टूडेंट्स, टीचर या फिर कर्मचारी के साथ जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर अन्याय न हो।
भेदभाव प्रत्यक्ष रूप से उत्पीड़न, अपमान या अलग व्यवहार के रूप में भी हो सकता है। वहीं अप्रत्यक्ष रूप से अवसरों पर अनदेखी करना, वंचित करना या पक्षपात भी इसके तहत आएगा। यूजीसी द्वारा यह साफ किया गया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में किसी भी स्तर पर इस तरह के व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जाएगा। वहीं विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, डीम्ड विश्वविद्यालयों समेत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा। ऐसे में संस्थान प्रमुख को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह इन नियमों का सख्ती से पालन करें।
नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र की स्थापना जरूरी है। वंचित और पिछड़े वर्गों के छात्रों व कर्मचारियों को यह केंद्र शैक्षणिक, सामाजिक और वित्तीय मार्गदर्शन प्रदान करेगा। वहीं भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करके उनका समाधान करना भी इसकी प्रमुख जिम्मेदारी होगी।
ईओसी को भेदभाव की शिकायत दर्ज करने के लिए ऑनलाइन प्रणाली संचालित करना होगी। जिससे कि पीड़ित व्यक्ति बिना किसी डर या भय के अपनी बात को रख सके। वहीं अगर कोई कॉलेज अपने लेवल पर समान अवसर केंद्र स्थापित करने में सक्षम नहीं है। तो इससे संबंद्ध विश्वविद्यालय यह जिम्मेदारी निभाएगा। यूजीसी का मानना है कि इन प्रावधानों से शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता, समानता और विश्वास का माहौल मजबूत होगा।