By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Aug 13, 2026
कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तनाव एक बार फिर सड़कों तक पहुंच गया है। कावेरी जल छोड़ने के मुद्दे पर गुरुवार को कर्नाटक में राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया गया। इस दौरान अलग-अलग इलाकों में प्रदर्शन हुए, लेकिन कोप्पल में विरोध का तरीका थोड़ा अलग रहा। यहां प्रदर्शनकारियों ने तमिलनाडु नंबर वाले ट्रकों को रोका, लेकिन ट्रक चालकों से बहस या झड़प करने के बजाय उन्हें गुलाब के फूल थमा दिए। प्रदर्शनकारियों ने फूल देते हुए ट्रक चालकों से कहा कि वे कावेरी पानी के मुद्दे पर कर्नाटक को 'उकसाने' की कोशिश न करें। इस पूरे घटनाक्रम का संदेश साफ था—विरोध जरूर है, लेकिन इसे टकराव में बदलने से बचने की कोशिश भी की जा रही है।
कर्नाटक में बंद का मुख्य कारण कावेरी जल विनियमन समिति यानी सीडब्ल्यूआरसी के उस निर्देश का विरोध है, जिसमें कर्नाटक को 15 दिनों तक तमिलनाडु के लिए 12 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा गया है। कर्नाटक के प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि राज्य खुद पानी की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का फैसला कर्नाटक के किसानों और आम लोगों की जरूरतों को प्रभावित कर सकता है। इसी मुद्दे को लेकर कर्नाटक ओक्कुटा ने 13 अगस्त को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया। कोप्पल जिला इकाई की ओर से जारी पत्र के अनुसार, बंद का नेतृत्व संगठन के प्रदेश अध्यक्ष वाटाल नागराज कर रहे थे। वहीं, कर्नाटक रक्षणा वेदिके युवा शाखा के प्रदेश अध्यक्ष बीजन्ना राजन्ना और सुवर्ण कर्नाटक युवा सेना के प्रदेश अध्यक्ष टीके नायक को प्रदर्शन के समन्वय की जिम्मेदारी दी गई थी। गठनों ने सुबह 6 बजे से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन करने की अपील की थी। टोल गेट, राष्ट्रीय राजमार्ग और दूसरे प्रमुख रास्तों को प्रदर्शन के लिए चुना गया था।
बंद बुलाने वाले संगठनों का तर्क है कि कावेरी के पानी पर फैसला लेते समय कर्नाटक की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। खासकर उन इलाकों में जहां पीने के पानी और सिंचाई की जरूरत पहले से ही चुनौती बनी हुई है। यही वजह है कि कन्नड़ संगठनों ने राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए बंद का रास्ता अपनाया। उनका कहना है कि किसानों और राज्य की जल जरूरतों को नजरअंदाज करके तमिलनाडु के लिए लगातार पानी छोड़ना उचित नहीं है।
राज्यव्यापी बंद को देखते हुए बेंगलुरु समेत कई शहरों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। पुलिस की कोशिश रही कि प्रदर्शन के दौरान किसी तरह की हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचे। इस बीच तमिलनाडु से कर्नाटक आने वाली सरकारी बसों की आवाजाही भी पूरी तरह थमी नहीं। मेकेदातु बांध के मुद्दे और कावेरी विवाद को लेकर कन्नड़ संगठनों के बंद के बावजूद तमिलनाडु की सरकारी बसें होसुर के रास्ते कर्नाटक में प्रवेश करती रहीं। इससे साफ है कि बंद और विरोध के बीच दोनों राज्यों के बीच सामान्य परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह रोकना आसान नहीं है।
कावेरी नदी कर्नाटक से निकलती है, तमिलनाडु से होकर गुजरती है और आखिर में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। नदी के पानी पर दोनों राज्यों की निर्भरता काफी ज्यादा है। यही वजह है कि पानी के बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा है। इस विवाद को सुलझाने के लिए कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया था। बाद में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और उससे जुड़े तंत्र के जरिए दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे और जलाशयों की स्थिति के आधार पर निर्देश दिए जाने लगे। लेकिन समस्या तब फिर सामने आती है जब बारिश उम्मीद से कम होती है या कर्नाटक के जलाशयों में पानी का स्तर नीचे चला जाता है। ऐसी स्थिति में कर्नाटक अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देने की मांग करता है, जबकि तमिलनाडु अपने हिस्से का पानी मिलने पर जोर देता है। यही खींचतान इस बार भी सड़क से लेकर राजनीति और अदालत तक पहुंचती दिखाई दे रही है। तमिलनाडु के सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले के बाद अब मामले का अगला रुख कानूनी प्रक्रिया और दोनों राज्यों के रवैये पर निर्भर करेगा।
कावेरी विवाद पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पहले ही सर्वदलीय बैठक कर चुके हैं। बैठक में उन्होंने कहा था कि सरकार राज्य के किसानों और आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। शिवकुमार के मुताबिक, कर्नाटक अभी भी कम बारिश जैसी स्थिति से जूझ रहा है। राज्य में अनुमानित बारिश की तुलना में करीब 30 से 35 फीसदी ही बारिश होने की बात उन्होंने कही थी। ऐसे में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता स्वाभाविक है। उन्होंने किसानों से अपील की थी कि सरकार की ओर से दिशा-निर्देश जारी होने तक धैर्य बनाए रखें। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया था कि सीडब्ल्यूआरसी और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से कर्नाटक को 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया है।
उन्होंने जलाशयों की स्थिति की जानकारी देते हुए कहा था कि कबिनी में करीब 24 हजार क्यूसेक और कृष्णा राजा सागर यानी केआरएस में करीब 22 हजार क्यूसेक पानी की आवक हो रही थी। उनके मुताबिक, बांध की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी पानी छोड़ा गया था। शिवकुमार ने दावा किया था कि सर्वदलीय बैठक में सरकार के फैसले को सभी दलों का समर्थन मिला। भाजपा नेताओं के केआरएस बांध का दौरा करने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि उन्होंने भी मौके की स्थिति को समझा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि वह कन्नड़ संगठनों से बातचीत करेंगे और उनसे बंद का आयोजन नहीं करने की अपील की थी। फिलहाल कावेरी का पानी एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु की राजनीति के बीच बड़ा मुद्दा बन गया है। कोप्पल में गुलाब देकर किया गया विरोध भले ही अपने तरीके में शांत दिखा हो, लेकिन उसके पीछे राज्य में पानी को लेकर बढ़ती बेचैनी और किसानों की चिंता साफ दिखाई देती है।