By रेनू तिवारी | Aug 29, 2026
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (CGST) के एडिशनल कमिश्नर व IRS अधिकारी विनय कुमार कनहेटी (IRS-2009), सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा और एक बिचौलिए को 40 लाख रुपये की रिश्वतखोरी के मामले में गिरफ्तार किया था। हालांकि, ठाणे की विशेष अदालत ने CBI की 5 दिनों की पुलिस कस्टडी रिमांड अर्जी को खारिज करते हुए तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी को ही 'गैर-कानूनी' करार दे दिया है। कोर्ट ने गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने के आधार पर सभी आरोपियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
बातचीत के बाद, यह मांग घटाकर 40 लाख रुपये कर दी गई। आरोपी सरकारी अधिकारियों ने एक प्राइवेट व्यक्ति के ज़रिए रिश्वत लेने का इंतज़ाम किया था और उसी के अनुसार शिकायतकर्ता को पेमेंट करने के लिए कहा था।
CBI ने जाल बिछाया और उस प्राइवेट व्यक्ति को 40 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। बाद में CGST सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा और CGST के एडिशनल कमिश्नर विनय कुमार कनहेटी ने भी रिश्वत की रक़म लेने की बात स्वीकार की। आरोपियों के ठिकानों पर तलाशी के दौरान 43 लाख रुपये नकद और लगभग 90 लाख रुपये की कीमत के गहने बरामद हुए।
कोर्ट ने रिमांड की अर्ज़ी ठुकराई, गिरफ़्तारी को ग़ैर-क़ानूनी माना
ठाणे की स्पेशल कोर्ट ने CBI ACB मुंबई की रिमांड अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए, CBI की आगे की कस्टडी में पूछताछ की मांग को ठुकरा दिया और आरोपी नंबर 3, IRS अधिकारी और CGST के एडिशनल कमिश्नर विनय कुमार कनहेटी की गिरफ़्तारी को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया।
CBI ने भ्रष्टाचार के एक सुनियोजित कृत्य का आरोप लगाते हुए पाँच दिन की पुलिस कस्टडी की मांग की थी। बचाव पक्ष ने गिरफ़्तारी की वैधता को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट के 'विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य व अन्य' और 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य' मामलों के फ़ैसलों का हवाला दिया। उन्होंने गिरफ़्तारी के आधार और कारणों को बताने की ज़रूरी शर्त और गिरफ़्तारी की वैधता की जांच करने की मजिस्ट्रेट की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया। गिरफ़्तारी के मेमो और केस डायरी की जांच करने पर कोर्ट ने पाया कि गिरफ़्तारी के रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आरोपियों को उनकी गिरफ़्तारी के आधार और कारणों के बारे में ठीक से बताया गया था और वे उन्हें समझ गए थे। कोर्ट ने यह भी देखा कि आरोपियों के रिश्तेदारों को लिखित रूप में सूचित नहीं किया गया था और इसलिए यह माना कि तीनों आरोपियों की गिरफ़्तारी कानूनी नहीं थी।
कोर्ट को कस्टडी में आगे पूछताछ के लिए कोई संतोषजनक कारण भी नहीं मिला, खासकर इसलिए क्योंकि कथित रिश्वत की रकम पहले ही ज़ब्त की जा चुकी थी और आरोपियों से मोबाइल फ़ोन भी बरामद कर लिए गए थे। इसके चलते CBI की रिमांड अर्ज़ी खारिज कर दी गई।
कोर्ट ने तीनों आरोपियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वे 15,000 रुपये का PR बॉन्ड (व्यक्तिगत मुचलका) भरें और उतनी ही राशि की ज़मानत दें। कोर्ट ने उन्हें जांच में सहयोग करने का भी निर्देश दिया, जब भी उन्हें बुलाया जाए।
इस मामले में आगे की जांच जारी है।
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